चलो भाग चलें देवघर की ओर (1989) गायक : संजय प्रभाकर
1998 ई. बैजनाथधाम देवघर निवासी संजय प्रभाकर ने महादेव बैद्यनाथ की सबसे पहली ऑडियो कैसेट का निर्माण एवं भजन लेखन एवं गायन किया था। इसके पहले पटना के मुन्ना सिंह के भोजपुरी शिव भजन एवं लखबीर सिंह लक्खा की गाई ‘पगली’ 1988 ई. में छिटपुट काँवड़ियों के लिए उपलब्ध् थी। 88 में देवघर में सावन मेले के अवसर पर टावर चौक स्थित भारती पुस्तक भंडार के चबूतरे पर संजय प्रभाकर एवं उनके भाईयों ने मिलकर ऑडियो कैसेट की दुकान खोली थी। 88 के पूर्व संजय प्रभाकर देवघर के दर्शनिया में अगरबत्ती एवं अन्य पूजन सामग्रियों की दुकान श्रावणी मेले पर लगाया करते थे। इसके बाद इस परिवार ने दर्शनिया में लाखों काँवड़ियों की सहायतार्थ ‘खोया-पाया सूचना केन्द्र’ चलाया था। एक साल तो दर्शनिया में ही एक होटल भी चलाया गया जिसमें मारवाड़ी ‘कढ़ी’ ने काँवड़ियों को अपनी ओर आकर्षित किया था। इस प्रकार संजय प्रभाकर एवं उनके परिवार ने देवघर को श्रावणी मेला के अवसर पर स्थानीय लोगों के लिए व्यापार के नवीन अवसरों को प्रस्तुत किया। आज भी सभी देवघर वासी इस बात को सहर्ष स्वीकार करते हैं कि यदि संजय प्रभाकर ने पहली कैसेट नहीं बनाई होती तो आने वाले 5-10 वर्षों तक यह व्यवसाय देवघर के बाहर वालों तक ही सीमित रहता। ‘चलो भाग चलें देवघर की ओर’ ने स्थानीय भजन गायकों, भक्त कवियों और संगीतज्ञों के लिए अपनी प्रतिभा को लाखों लोगों तक पहुँचाने का सुगम रास्ता प्रदान किया। इसमें कोई दो मत नहीं है कि 20 वर्ष के बाद देवघर का संगीत बाजार अपने चरमोत्कर्ष पर पहुँच गया है। कैसेट उद्योग के बाद देवघर को श्रावणी संगीत बाजार अब वीडियो ऐलबम उद्योग की ओर उन्मुख हो चुका है। देवघर के लगभग सभी कलाकारों, वीडियो निर्माताओं का मानना है कि वह सभी बाबा के आशीर्वाद एवं संजय प्रभाकर की प्रेरणा से ही लगातार सफल होते जा रहे हैं। यही कारण है कि देवघर में प्रतिवर्ष 2-4 स्थानीय भजन गायक भजन गायन के क्षेत्रा में अपना भाग्य आजमाने हेतु एक बड़ा मंच और बाजार प्राप्त कर रहे हैं। संजय प्रभाकर इस फलते-फूलते भक्ति संगीत के बाजार को देखकर इसे केवल महादेव बाबा बैजनाथ की असीम कृपा मानते हैं।’चलो भाग चलें देवघर की ओर’ की रिकॉर्डिंग कोलकाता में की गई थी। इसमें कुल 10 भजन थे। सभी भजनों को संजय प्रभाकर ने लेखनी दी थी। भजनों के बोल इस प्रकार हैं- काँवड़ लेकर चल पड़े (तेरे दर को छोड़ चले), जाना है जाना है मुझे जाना है (होँ बोलो कौन है वो) भजले मनवा भोले को (क्या करते थे साजना), शिव का नाम लिया (तेरा नाम लिया), भोले भूल न जाना (मितवा भूल न जाना), सत्यम शिव सुन्दरम (गंगा जमुना सरस्वती), एक दो तीन (राम लखन), अब भटकने से क्या फायदा, चलो-चलो ऐ भक्तों (हवा-हवा) एवं चलो भाग चलें देवघर की ओर (चलो भाग चलें पूरब की ओर)।उस जमाने में यह देवघर के एक भजन गायक की पहली कैसेट बनी जिसकी कम से कम पाँच पायरेसी आई थी। बाजार में देर से उपलब्ध्ता के कारण दो-दो सौ रुपये में यह ब्लैक भी हुई। नरसिंह टाकीज के पास एक दुकानदार ने इसे तीन सौ रुपये में बेचा था, जबकि इसका अधिकतम मूल्य मात्रा 18 रुपये था। 1989 ई. में जब यह कैसेट आई तो स्थानीय युवकों के लिए रोजगार के अवसर भी लेकर आई। सैकड़ों युवकों ने अपने-अपने घरों के चबूतरों पर कैसेट की दुकाने खोलीं और जमकर कमाई भी की। यह इसी का सुपरिणाम है कि आज देवघर में श्रावणी मेला पर एक हजार से भी अधिक दुकानें केवल भजनों की कैसेटों और सीडी की होती है। 1990 ई. में संजय प्रभाकर के स्वर में ‘शिवगंगा’ की सफलता ने टी सीरीज जैसी कम्पनी को अगले वर्ष श्रावणी मेला पर शिव भजनों की कैसेट बनाने के लिए प्रेरित किया। उत्तार भारत के रामअवतार शर्मा एवं नरेन्द्र चंचल ने शिवगंगा की सफलता के बाद ही काँवड़ भजन गायन का श्रीगणेश किया।
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