श्री गणेशाय नम: :: श्याम प्रभु खाटू वाले का मुख्य समाचार पत्र ::


सबसे उंची चरण पादुका सेवा

September 12th, 2009 admin Posted in सम्पादकीय | No Comments »

15-aug-2.gif

जब भगवान श्रीराम को वनवास मिला तो उनके भाई भरत ने राज गद्दी लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वह अपने बड़े भाई श्रीराम की चरण पादुकाओं को ही अयोध्या की राजगद्दी पर विराजमान करेंगे और वनवासी राम की ही भाँति स्वयं भी 14 वर्षों तक वल्कल वस्त्र ही धरण करेंगे। रामायण के इस प्रसंग ने चरण पादुकाओं के महत्व को सबसे अध्कि उत्कृष्ट ढ़ंग से बताया है। चरण पादुकाओं के इसी महत्व को समझते हुए ही दिल्ली में कुछ ऐसी श्याम संस्थाएँ अस्तित्व में आईं जिन्होंने प्रभु के भक्तों की चरण पादुकाओं की सेवा करना ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। दिल्ली में ‘श्री श्याम चरण रज समिति (पंजी.) पश्चिम विहार’ एवं ‘श्री श्याम चरण पादुका सेवा (नांगलोई) दो ऐसी संस्थाएँ हैं जो एक-डेढ़ दशकों से दिल्ली एवं आस-पास में आयोजित होने वाले विभिÂ धर्मिक आयोजनों में ‘जूता सेवा’ करते आ रहे हैं। विशेषकर खाटू श्यामजी के संकीर्तनों महोत्सवों में इन जूता सेवी संस्थाओं की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिससे श्याम महोत्सवों का एक सुव्यवस्थित स्वरूप दृष्टिगत होने लगता है।जूता सेवा विशुद्ध सेवा भावना से की जाती है। इसके लिए दर्शनार्थी एवं भजन प्रेमियों से किसी प्रकर का काई शुल्क नहीं वसूला जाता है। जूता सेवा करने वाले वो लोग हैं जो संभ्रांत परिवारों से हैं जिन्हें ठाकुरजी ने हर प्रकार का आशीर्वाद दे रखा और जिन परिवरों पर प्रभु की कृपा बनती जा रही है। यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि जूता सेवा करने वालों में ऐसे लोग या श्रमिक नहीं होते हैं जिन्हें इस सेवा के लिए पारश्रमिक दिया जाता हो। जनता की सेवा को ही प्रभु की सेवा, पूजा, अर्चना एंव अराध्ना मानने वाले जूता सेवक अपने हाथों से उन जूता-चप्पलों को उठाकर और सहेजकर रखते हैं जो नए, पुराने, गंदे और न जाने किन-किन स्थानों से होते हुए जूता सेवा शिविर तक आते हैं। चरण पादुकाएँ सम्पूर्ण आयोजन तक सुरक्षित और सम्भालक रखी जाती हैं, जिस के परिणाम स्वरूप भक्त निश्चिंत होकर आयोजनों में तन-मन से जुड़कर आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। यदि नि:शुल्क जूता सेवक ना हों तो किसी व्यक्ति को यही नहीं पता चलेगा कि उसने अपना जूता कहाँ उतारा था और उनका जूता किसी ने भूलवश पहन लिया हो या किसी उइाईगिरे ने उनके जूतों को चुरा लिया हो।गंदे जूतों को अपने हाथों से उठाना, उन्हें सहेजकर रखना और फिर अपने हाथों में उठाकर जूतों-चप्पलों को वापस भी करना, सचमुच  सबसे बड़ी सेवा का काम है। परन्तु ऐसे जूता सेवकों को अक्सर कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। जैसे आयोजन स्थल पर जूता सेवा के लिए समुचित स्थान नहीं मिलना, जूता रखने हेतु दरियाँ, टेबल, टेबल पर बिछाने हेतु चादर, गर्मी में पंखे, रात्रि के समय प्रकाश, पीने का पानी आदि..। कुछ जूता सेवी संस्थाओं को उचित सम्मान भी नहीं मिल पाता है, पफलत: उन्हें ऐसा लगने लगता है कि जैसे वह सेवा नहीं अपितु आयोजकों की नौकरी कर रहे हैं। आयोजन के अंत में जूता सेवकों को आयोजकों से प्रसाद एवं स्मृति चिन्ह आदि प्राप्त करने में भी कई बार असुविध का सामना करना पड़ता है। काम निकल जाने के बाद आयोजक आयोजन स्थल से जूता सेवकों को बिना धन्यवाद दिए ही फा-दफा होने की भी शिकायतें मिलती रहती हैं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि जो वृक्ष फल देता है वहीं झुकता है, जो जितना अधिक नीचे गिरता है वह उतना ही अधिक उंचा उठता है। जूता सेवा ठाकुरजी के चरणों की सेवा है और चरणों की सेवा से उंची सेवा कोई और हो सकती है क्या? वस्तुत: पूजा-पाठ करने, भजन गाने, प्रभु की ज्योत पर बैठने, दरबार सजाने, ठाकुरजी का श्रृंगार करने से जो पुण्य प्राप्त होता है उससे हजार गुणा अध्कि पुण्य किसी आयोजन में ‘नि:शुल्क जूता सेवा’ करने से मिलता है। आवश्यक्ता है कि आयोजक और जूता सेवक आपस में मिल बैठ के कुछ ऐसी व्यवस्था करें ताकि आयोजनों में आयोजनों में लोग और भी अध्कि सुभावनाओं से जुड़ सकें।

AddThis Social Bookmark Button

धार्मिक स्थलों की गलियों और रास्तों को पीकदान न बनाएँ

June 24th, 2008 admin Posted in सम्पादकीय | No Comments »

भारत के अनेक धर्मिक स्थलों में पान, गुटका, तम्बाकू, चाट, चटपटी तथा खाने-पीने की अनेक वस्तुएँ हर समय उपलब्ध् रहती हैं। तीर्थयात्री ऐसी सामग्रियाँ बड़े ही चाव से खाते-पीते हैं। बड़ी दुकानों में तो कूड़ादान की व्यवस्था होती है। किन्तु छोटी दुकानों में कूड़ादान अंतिम साँसें गिन रहा होता है। फलस्वरूप जूठन, दोना-पत्तल और चाय की प्यालियाँ सड़कों और गलियों पर रुलती रहती हैं। मिट्टी के जूठे बर्त्तन तीर्थयात्रियों के पाँवों और वाहनों की ठोकर से इधर-उधर लुढ़कर अंततः सड़कों पर ही चकनाचूर हो जाते हैं। और तो और नालियों का गंदा पानी सड़कों और गलियों को सींचता रहता हे, जिसपर तीर्थयात्रियों को सम्भल-सम्भल कर चलना पड़ता है। पान, गुटका, तम्बाकू खाने वालों के लिए तो सड़कें ही पीकदान का काम करती हैं। पान, गुटका, तम्बाकू खाने वाले यत्र-तत्र-सर्वत्र थूकते रहते हैं। पान की थूक से तो सड़कें लाल हो जाती हैं।
धूम्रपान करने वाले माचिस की तीलियाँ और सिगरेट के अवशेष बीच सड़कों पर ही फैंक देते हैं। कुछ युवा किस्म के सिगरेट प्रेमी तो अपने जूतों से सिगरेट की को पीच कर बूझाते हुए स्वयं को किसी फिल्मी अभिनेता सा अनुभव करते हैं। जो लोग सिगरेट को बुझाकर नहीं फैंकते हैं, सिगरेट ऐसे जलते हुए टुकड़े नंगे पाँव चलने वालों के पाँवों को जलाने से नहीं चूकते हैं। हिन्दू धर्म में चमड़े की वस्तुएँ बेल्ट, बैग, जूते-चप्पल आदि लेकर मंदिर में प्रवेश करना वर्जित माना जाता है। इसी कारण अपने निवास स्थान से भक्त नंगे पाँव ही मंदिर तक आते-जाते हैं।
जब कोई व्यक्ति सड़क पर अथवा चलते हुए वाहन में बेठे-बैठ थूकता है, तो उसपर गुस्सा उतारते हुए ‘बिहारी’ की गाली दी जाती हे। वस्तुतः आम हिन्दुस्तानियों की यही सोच है कि बिहार राज्य के रहने वाले बिहारी थूकने की प्रक्रिया में प्रथम होते हैं। ऐसा समझने वाले वस्तुतः बहुत बड़ी भूल करते हैं। बिहार में सड़कों को वर्ष में कम से कम दोबार वही बिहारी अपने हाथों से स्वच्छ करते हैं, जिन्हें थूकने के लिए अपमानित किया जाता है। छठ पूजा के समय बिहार की प्रत्येक गली और सड़क को जिसपर चलकर छठ पूजा करने वाले भक्त किसी नदी और तालाब तक नंगे पाँव जाते हैं, उन्हें उन्हीं बिहारियों द्वारा धोया जाता है। सड़कों और गलियों को धेने का ऐसा उदाहरण भारत के किसी अन्य भाग में देखने को नहीं मिलता है।
भारत के अनेक तीर्थ स्थलों में पैदल, दंडवत और पेटपलनिया करने करते हुए अपने आराध्य के दर्शन करने की मान्यता है। वैद्यनाथधाम देवघर झारखंड में प्रतिवर्ष हजारों शिव भक्त दंडवत करते हुए देवघर भोलेनाथजी के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करनाने आते हैं। खाटूधम राजस्थान में भी हजारों श्याम प्रेमी प्रतिवर्ष पेट पेटलनिया करते हुए श्याम मंदिर तक आते हैं। खाटूधाम की गलियाँ यद्यपि साफ-सूथरी होती हैं, किन्तु पेटपलनिया करने वाले जानते हैं, कि उन्हें गलियों में पेटपलनिया करते समय थूक ओर गंदगी का सामना करना पड़ता है।
धर्मिक स्थलों में सड़कों और गलियों को कूड़ादान बनाने के लिए कौन जिम्मेवार हैं? आने वाले तीर्थयात्री, स्थानीय निवासी या सफाई कर्मचारी? शहर, गाँव की सफाई तो प्रतिदिन होती है, और गंदगी भी प्रतिदिन होती है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि पान, गुटका, तम्बाकू खाकर यात्र-तत्र थूकने वाले, जूठे दोने-पत्तल सड़कों पर डालने वाले, और जलती सिगरेट को सड़कों और गलियों पर पर फैंकने वाले इस अपराध के लिए जिम्मेवार माने जा सकते हैं। दुकानदारों को भी चाहिये कि वह अपनी दुकानों के में कूड़ादान, पीकदान आदि लगाएँ। सफाई कर्मचारियों को चाहिये कि वह इतनी अधिक सफाई रखें कि उस स्वच्छता को देखकर वहाँ गंदगी डालने की सोच भी न सकें। विशेषकर तीर्थयात्रियों को सफाई की व्यवस्था हेतु एक अलग से स्वच्छता समिति बनाई जानी चाहिये जो विशेष पर्वों, आयोजनों और अवसरों पर सड़कों व गलियों की स्वच्छता की विशेष व्यवस्था करें।
दिल्ली में धर्मिक आयोजनों में जूता सेवा को सबसे बड़ी सेवा माना जाता है। जूता सेवा अर्थात आगन्तुक भक्तों के जूतों को स्वयं भक्तों द्वारा अपने हाथों से सम्भाल कर रखना और दर्शन-पूजनकर लौटते समय अपने हाथों से ही उन्हें लौटना। जूता सेवा की ही तरह सड़क एवं गली सफाई सेवा की भी व्यवस्था भक्तों को करनी चाहिये। थोड़ी-थोड़ी दूर पर स्वयं सेवकों को तैनात करना चाहिये जिससे वह पान, गुटका, आईसक्रीम, आदि खाने वालों और थकने वालों को सड़क पर थूकने से मना करें। और किसी ने थूक दिया तो उसे अपने हाथों से साफ करें। थूकने और गंदगी फैलाने वाले के सामने ही जब कोई भक्त स्थान को स्वच्छ करेगा तो गंदगी फैलाने वाले लज्जित होकर भविष्य में अपनी भूल को दोहराने से परहेज करेंगे।
खाटूधाम में प्रतिवर्ष बड़े-बड़े भंडारे लगाए जाते हैं। भंडारों में भक्तों द्वारा जूठे ग्लास, दोने आदि सड़क पर डाल दिए जाते हैं। पदयात्रियों को ऐसी जूठन पर ही चलना पड़ता है। तीर्थस्थलों में जूठन, थूक आदि की समस्या को भक्तों द्वारा स्थानीय निवासियों की मदद से सुधरा जा सकता है।

AddThis Social Bookmark Button

माता-पिता की पूजा सबसे बढ़कर धर्म है

June 21st, 2008 admin Posted in सम्पादकीय | No Comments »

यह बात बार-बार दोहराई जाने वाली एवं हरक्षण स्मरण रखने योग्य है कि इस संसार में सबसे बढ़कर धर्म माता-पिता की सेवा और पूजा ही है। बार-बार दोहराने वाली बात यह इसलिए है कि हम इस रहस्य को भूल जाते हैं। मुख्य बात यह है कि इस बात को माता-पिता ही अपनी संतान को भली-भाँति समझा सकते हैं। माता-पिता को चाहिये कि वह अपनी संतान को अत्यधिक लाड़-प्यार न करें- ‘अतिशय रगड़ करै जो कोई, अनल प्रगट चंदन ते होई।’ माता-पिता की पूजा एवं उनकी सेवा का तातर्प्य है, उन्हें प्रणाम करना, उनकी आज्ञा का पालन करना, माता-पिता को किसी भी प्रकार का कष्ट ना हो इस बात का पल-पल ध्यान रखना, उनके योग्य भोजन, दवा एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था हेतु तत्पर रहना। बच्चे यह सब तभी सीख पाएँगे जब माता-पिता स्वयं अपने माता-पिता या बड़ों की इसी प्रकार से सेवा-पूजा करेंगे। प्रत्येक इंसान को यह संकल्प लेना चाहिये कि वह अपने माता-पिता तथा अन्य बुजुगों यथा दादा-दादी, नाना-नानी एवं गुरुजनों का आदर-सस्म्मान करेंगे।
जब हम अपने माता-पिता की पूजा व सेवा उनके जीते जी नहीं कर सकते हैं, तो उनकी मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करने का क्या अर्थ रह जाएगा? जन्म देने वाले माँ-बाप के जीते जी उनका अनादर, अवहेलना, अपमान करने वाले, अपशब्द बोलने वाले एवं उन्हें मारने-पीटने व धमकाने वाले, माता-पिता की मृत्यु के पश्चात किस मुँह एवं भावना से उनका अंतिम संस्कार, श्राद्ध कर्म एवं पिंड दान करेंगे? समाज में ऐसा देखा जाता है कि माता-पिता एवं वृद्धों की अवहेलना करने वाले अभाव ग्रस्त एवं दुखी जीवन बिताते हैं और समाज भी उनका साथ नहीं देता है। हमारे माता-पिता चाहे जैसे भी हों यथा अधिक बोलने वाले हों, डाँटने-डपटने वाले हों, तो भी हमें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये।
देखा गया है कि अपने माता-पिता एवं गुरुजनों के चरण स्पर्श करने एवं उन्हें प्रणाम करने में बच्चों को लज्जा आती है। यह एक विडंबना है कि हम प्रतिदिन अनेक दुष्कर्म करते हैं, तब हमें लज्जा नहीं आती है। ऐसी स्थिति से बचने का उपाय यही है कि हम अपने बच्चों को बाल्यकाल से ही बड़ों का सम्मान करना सिखाएँ।
यदि हम अपने माता-पिता की सेवा पूजा करते हों तो, हम चाहे मंदिर न जाएँ, भागवत कथा न सुनें तो भी कोई अंतर नहीं आएगा। और यदि हम अपने माता-पिता का अपमान करते हैं, और फिर मंदिर जाते हैं, भागवत कथा सुनते हैं तो हमें उसका कोई भी पुण्य प्राप्त नहीं होगा। यही कारण है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों ने भी माता-पिता की पूजा-सेवा को समस्त धार्मिक अनुष्ठानों से सर्वोपरी बताया है।
महादेव शिव परिवार की एक घटना माता-पिता के महत्व को प्रतिपादित करने हेतु सर्वमान्य है। एकबार देवताओं ने अमृत से एक दिव्य लड्डू बनाकर उसे माता पार्वती को दिया। दिव्य लड्डू को देखकर बालक कार्त्तिकेय एवं गणेश ने उसे प्राप्त करना चाहा। माता पार्वती ने पुत्रों से कहा कि तुम्हारे पिताजी एवं मेरी इच्छा है कि इस लड्डू का विभाजन न किया जाए। हम तुम बच्चों की एक जाँच परीक्षा लेना चाहते हैं, जो भी उसमें उत्तीर्ण होगा, यह लड्डू उसे प्रदान किया जाएगा। माता पार्वती ने कहा कि तुम दोनों बालकों में से जिसका धर्म सबसे बढ़कर होगा, उसी को यह दिव्य लड्डू दिया जाएगा। यह सुनते ही बालक कार्त्तिकेय अपने वाहन मयुर वाहन पर सवार होकर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने यह सुन रखा था कि तीर्थयात्रा से मिलने वाला धर्म अतुलनीय होता है। उधर गणेशजी ने निर्णय लिया कि वह अपने माता-पिता की परिक्रमा करेंगे, क्योंकि माता-पिता की परिक्रमा मात्र से तीर्थयात्रा का सारा पुण्य मिल जाता है। फलतः बालक गणेश ने झटपझ अपनी माता पार्वती एवं पिता महादेव शिव को प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा लगाई। जब कार्त्तिकेय तीर्थयात्रा से लौटे तो माता पार्वती ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा- ÷÷सभी तीर्थों में स्नान, सभी देवों की पूजा, समस्त यज्ञों एवं समस्त व्रतों से बढ़कर माता-पिता की पूजा होती है। माता-पिता की पूजा की अतुलनीय है। अतः यह लड्डू गणेश को मिलेगा। माता-पिता को ही अपना सर्वस्व मानकर उनकी प्रदिक्षणा कर पूजा करने वाले श्रीगणेश इसी कारण देवताओं में अग्रपूज्य हुए।”

AddThis Social Bookmark Button

सशुल्क वीआईपी दर्शन से हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार?

June 21st, 2008 admin Posted in सम्पादकीय | No Comments »

यह कैसा धर्म हो गया है, जिसमें भगवान के दर्शन हेतु सशुल्क पास लेना पड़ता है? भगवान का मंदिर है या कोई सिनेमा हॉल? प्राचीन समय में हिन्दू धर्म ऐसे ही कुछ कारणों के कारण कई फाड़ में विभक्त हो गया था। यदि तिरुपति बालाजी, शिरडी साँई, वैष्णो देवी के सुविख्यात मंदिरों की भाँति अन्य मंदिरों में भी दर्शन हेतु टिकटें कटानी पड़ीं तो वह दिन दूर नहीं जब चोरों को, हिन्दुओं को ईसाई बनाने में अधिक परिश्रम नहीं करना होगा। यदि ऐसा ही होता रहा तो एक समय ऐसा आएगा जब एक बड़ी संख्या में खिन्न हिन्दू एक बार पुनः किसी अन्य धर्म में पलायन कर जाएँगे। इन योजनाओं से सबसे अध्कि खिन्न निर्धन व निम्न मध्यम वर्ग के भक्त प्रभावित होंगे। ज्ञातव्य है कि इसी वर्ग के लोग सबसे अधिक धर्म परिवर्त्तन करते हैं। जागो हिन्दुओं जागो!!

AddThis Social Bookmark Button

करते हो तुम कन्हैया

April 3rd, 2008 admin Posted in सम्पादकीय | No Comments »

सम्पूर्ण ब्रह्मांड के समस्त धर्म प्रेमियों को श्री श्याम संसार परिवार की ओर से जय श्री श्याम! श्री श्याम संसार ने आज से ६ वर्ष पूर्व सनातन धर्म के प्रचार का बीजारोपण किया था, उसके अंकुर अब प्रस्फुटित होने लगे हैं। श्री श्याम संसार अब वह पहला धर्मिक समाचार पत्रा बनकर संसार के एक-एक मनुष्य के लिए उपलब्ध हो गया है, चाहे वह इस पृथ्वी के किसी भी कोने में क्यों न रहते हों। श्री श्याम संसार ने जो आज तक जो भी उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं, वह सभी सकारात्मकता की पराकाष्ठा मानी गई हैं।

shyamsansar.com आधुनिक मानव समाज का एक ऐसा माध्यम बन रहा है जिसने भारतीय सभ्यता, संस्कृति और मानव धर्म को जनसाधराण के लिए सर्वसुलभ बना दिया है। अब कोई भी जिज्ञासु किसी भी समय, कही भी http://shyamsansar.com को लॉग ऑन कर हिन्दू धर्म से सम्बन्धित समाचारों से अवगत हो सकता है।

shyamsansar.com से पहले कुछ वर्षों में श्री श्याम संसार ने भजन-कीर्तन के समाचारों से अतिरिक्त राष्ट्रीय महत्व के समाचारों को पमुखता से प्रकाशित किया। अमरानाथ, कैलाश मानसरोवर, राम सेतु, रावण के मृत शरीर, श्रीलंका में हनुमानजी के चिन्ह, लंका की खोज, इंगलैण्ड में शंभु नामक बैल को मौत की सजा, कजाकिस्तान में हिन्दू मंदिर को वहाँ के भू-मापिफया द्वारा हड़पने का प्रयास, विराट हिन्दू सम्मेलन जैसे व्यापक हिन्दू हित के समाचारों को जिस प्रकार से प्रकाशित किया गया उससे आम लोगों में श्री श्याम संसार के प्रति विश्वसनियता में अप्रत्याशित वृद्ध हुई। श्री श्याम संसार ने हारे के सहारे की कृपा से यह भी सि कर दिया कि धर्मिक महत्व के समाचारों की संसार में कोई कमी नहीं है।

श्री श्याम संसार को श्री श्याम प्रभु खाटू वाले ने श्री श्याम मंदिर और खाटूश्यामजी की जनता के हित में समाचार प्राकशित करने हेतु चुना और उसे श्याम प्रभु खाटू वाले के मुख्य समाचार पत्रा बना दिया। इसका सीध प्रभाव उन पाठकों पर देखा गया जो खाटूश्यामजी के विकास से सम्बन्ध्ति समाचारों को जानने में रुचि रखते हैं। श्री श्याम संसार ने २००८ के पफाल्गुन मेले के आयोजन व्यवस्था के लिए उत्पÂ हो रहे भ्रम को दूर करने का सपफल प्रयास किया। श्री श्याम संसार ने ही आम भक्तों को बताया कि इस बार पफाल्गुन मेले की व्यवस्था के लिए किसी बाहरी व्यक्ति विशेष को आगे नहीं आने दिया जाएगा और श्री श्याम मंदिर कमेटी जिला प्रशासन के साथ मिलकर स्वयं मेले की व्यवस्था को संचालित करेगी।

श्री श्याम संसार ने श्याम महोत्सवों के अतिरिक्त विभिन्न धर्मिक महोत्सवों के सचित्र समाचार प्रकाशित किए। इसका सीधा लाभ उन भक्तों को मिला जो किसी कारण वश उस आयोजन में पहुँच नहीं पाए थे। पाठकों को ऐसे समाचारों को पढ़कर लगा जैसे वह उन महोत्सवों का सजीव चित्राण पढ़ रहे हों।
श्री श्याम संसार प्रत्येक शुक्ल एकादशी को खाटूधम में समाचार पत्रा की प्रतियाँ वितरित करता है। इस वितरण से लाखों भक्तों ने लाभ प्राप्त किया है। फाल्गुन मेला-२००८ में http://shyamsansar.com के माध्यम से सम्पूर्ण विश्व के अरबों लोगों के लिए श्री श्याम संसार बिल्कुल निःशुल्क सुलभ हो गया है। किसी धर्मिक समाचार पत्रा का यह अब तक सबसे बड़ा निःशुल्क वितरण है। कोई भी प्रेमी पाठक श्री श्याम संसार का कलर प्रिंट किसी भी स्थान पर इंटरनेट के माध्यम से प्राप्त कर सकता है।

AddThis Social Bookmark Button