
जब भगवान श्रीराम को वनवास मिला तो उनके भाई भरत ने राज गद्दी लेने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि वह अपने बड़े भाई श्रीराम की चरण पादुकाओं को ही अयोध्या की राजगद्दी पर विराजमान करेंगे और वनवासी राम की ही भाँति स्वयं भी 14 वर्षों तक वल्कल वस्त्र ही धरण करेंगे। रामायण के इस प्रसंग ने चरण पादुकाओं के महत्व को सबसे अध्कि उत्कृष्ट ढ़ंग से बताया है। चरण पादुकाओं के इसी महत्व को समझते हुए ही दिल्ली में कुछ ऐसी श्याम संस्थाएँ अस्तित्व में आईं जिन्होंने प्रभु के भक्तों की चरण पादुकाओं की सेवा करना ही अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया। दिल्ली में ‘श्री श्याम चरण रज समिति (पंजी.) पश्चिम विहार’ एवं ‘श्री श्याम चरण पादुका सेवा (नांगलोई) दो ऐसी संस्थाएँ हैं जो एक-डेढ़ दशकों से दिल्ली एवं आस-पास में आयोजित होने वाले विभिÂ धर्मिक आयोजनों में ‘जूता सेवा’ करते आ रहे हैं। विशेषकर खाटू श्यामजी के संकीर्तनों महोत्सवों में इन जूता सेवी संस्थाओं की अत्यंत ही महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, जिससे श्याम महोत्सवों का एक सुव्यवस्थित स्वरूप दृष्टिगत होने लगता है।जूता सेवा विशुद्ध सेवा भावना से की जाती है। इसके लिए दर्शनार्थी एवं भजन प्रेमियों से किसी प्रकर का काई शुल्क नहीं वसूला जाता है। जूता सेवा करने वाले वो लोग हैं जो संभ्रांत परिवारों से हैं जिन्हें ठाकुरजी ने हर प्रकार का आशीर्वाद दे रखा और जिन परिवरों पर प्रभु की कृपा बनती जा रही है। यह निर्विवाद कहा जा सकता है कि जूता सेवा करने वालों में ऐसे लोग या श्रमिक नहीं होते हैं जिन्हें इस सेवा के लिए पारश्रमिक दिया जाता हो। जनता की सेवा को ही प्रभु की सेवा, पूजा, अर्चना एंव अराध्ना मानने वाले जूता सेवक अपने हाथों से उन जूता-चप्पलों को उठाकर और सहेजकर रखते हैं जो नए, पुराने, गंदे और न जाने किन-किन स्थानों से होते हुए जूता सेवा शिविर तक आते हैं। चरण पादुकाएँ सम्पूर्ण आयोजन तक सुरक्षित और सम्भालक रखी जाती हैं, जिस के परिणाम स्वरूप भक्त निश्चिंत होकर आयोजनों में तन-मन से जुड़कर आनन्द प्राप्त कर सकते हैं। यदि नि:शुल्क जूता सेवक ना हों तो किसी व्यक्ति को यही नहीं पता चलेगा कि उसने अपना जूता कहाँ उतारा था और उनका जूता किसी ने भूलवश पहन लिया हो या किसी उइाईगिरे ने उनके जूतों को चुरा लिया हो।गंदे जूतों को अपने हाथों से उठाना, उन्हें सहेजकर रखना और फिर अपने हाथों में उठाकर जूतों-चप्पलों को वापस भी करना, सचमुच सबसे बड़ी सेवा का काम है। परन्तु ऐसे जूता सेवकों को अक्सर कुछ समस्याओं का भी सामना करना पड़ता है। जैसे आयोजन स्थल पर जूता सेवा के लिए समुचित स्थान नहीं मिलना, जूता रखने हेतु दरियाँ, टेबल, टेबल पर बिछाने हेतु चादर, गर्मी में पंखे, रात्रि के समय प्रकाश, पीने का पानी आदि..। कुछ जूता सेवी संस्थाओं को उचित सम्मान भी नहीं मिल पाता है, पफलत: उन्हें ऐसा लगने लगता है कि जैसे वह सेवा नहीं अपितु आयोजकों की नौकरी कर रहे हैं। आयोजन के अंत में जूता सेवकों को आयोजकों से प्रसाद एवं स्मृति चिन्ह आदि प्राप्त करने में भी कई बार असुविध का सामना करना पड़ता है। काम निकल जाने के बाद आयोजक आयोजन स्थल से जूता सेवकों को बिना धन्यवाद दिए ही फा-दफा होने की भी शिकायतें मिलती रहती हैं। हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिये कि जो वृक्ष फल देता है वहीं झुकता है, जो जितना अधिक नीचे गिरता है वह उतना ही अधिक उंचा उठता है। जूता सेवा ठाकुरजी के चरणों की सेवा है और चरणों की सेवा से उंची सेवा कोई और हो सकती है क्या? वस्तुत: पूजा-पाठ करने, भजन गाने, प्रभु की ज्योत पर बैठने, दरबार सजाने, ठाकुरजी का श्रृंगार करने से जो पुण्य प्राप्त होता है उससे हजार गुणा अध्कि पुण्य किसी आयोजन में ‘नि:शुल्क जूता सेवा’ करने से मिलता है। आवश्यक्ता है कि आयोजक और जूता सेवक आपस में मिल बैठ के कुछ ऐसी व्यवस्था करें ताकि आयोजनों में आयोजनों में लोग और भी अध्कि सुभावनाओं से जुड़ सकें।

