श्री गणेशाय नम: :: श्याम प्रभु खाटू वाले का मुख्य समाचार पत्र ::


माता-पिता की पूजा सबसे बढ़कर धर्म है

यह बात बार-बार दोहराई जाने वाली एवं हरक्षण स्मरण रखने योग्य है कि इस संसार में सबसे बढ़कर धर्म माता-पिता की सेवा और पूजा ही है। बार-बार दोहराने वाली बात यह इसलिए है कि हम इस रहस्य को भूल जाते हैं। मुख्य बात यह है कि इस बात को माता-पिता ही अपनी संतान को भली-भाँति समझा सकते हैं। माता-पिता को चाहिये कि वह अपनी संतान को अत्यधिक लाड़-प्यार न करें- ‘अतिशय रगड़ करै जो कोई, अनल प्रगट चंदन ते होई।’ माता-पिता की पूजा एवं उनकी सेवा का तातर्प्य है, उन्हें प्रणाम करना, उनकी आज्ञा का पालन करना, माता-पिता को किसी भी प्रकार का कष्ट ना हो इस बात का पल-पल ध्यान रखना, उनके योग्य भोजन, दवा एवं अन्य आवश्यक वस्तुओं की व्यवस्था हेतु तत्पर रहना। बच्चे यह सब तभी सीख पाएँगे जब माता-पिता स्वयं अपने माता-पिता या बड़ों की इसी प्रकार से सेवा-पूजा करेंगे। प्रत्येक इंसान को यह संकल्प लेना चाहिये कि वह अपने माता-पिता तथा अन्य बुजुगों यथा दादा-दादी, नाना-नानी एवं गुरुजनों का आदर-सस्म्मान करेंगे।
जब हम अपने माता-पिता की पूजा व सेवा उनके जीते जी नहीं कर सकते हैं, तो उनकी मृत्यु के पश्चात श्राद्ध करने का क्या अर्थ रह जाएगा? जन्म देने वाले माँ-बाप के जीते जी उनका अनादर, अवहेलना, अपमान करने वाले, अपशब्द बोलने वाले एवं उन्हें मारने-पीटने व धमकाने वाले, माता-पिता की मृत्यु के पश्चात किस मुँह एवं भावना से उनका अंतिम संस्कार, श्राद्ध कर्म एवं पिंड दान करेंगे? समाज में ऐसा देखा जाता है कि माता-पिता एवं वृद्धों की अवहेलना करने वाले अभाव ग्रस्त एवं दुखी जीवन बिताते हैं और समाज भी उनका साथ नहीं देता है। हमारे माता-पिता चाहे जैसे भी हों यथा अधिक बोलने वाले हों, डाँटने-डपटने वाले हों, तो भी हमें उनकी सेवा-पूजा करनी चाहिये।
देखा गया है कि अपने माता-पिता एवं गुरुजनों के चरण स्पर्श करने एवं उन्हें प्रणाम करने में बच्चों को लज्जा आती है। यह एक विडंबना है कि हम प्रतिदिन अनेक दुष्कर्म करते हैं, तब हमें लज्जा नहीं आती है। ऐसी स्थिति से बचने का उपाय यही है कि हम अपने बच्चों को बाल्यकाल से ही बड़ों का सम्मान करना सिखाएँ।
यदि हम अपने माता-पिता की सेवा पूजा करते हों तो, हम चाहे मंदिर न जाएँ, भागवत कथा न सुनें तो भी कोई अंतर नहीं आएगा। और यदि हम अपने माता-पिता का अपमान करते हैं, और फिर मंदिर जाते हैं, भागवत कथा सुनते हैं तो हमें उसका कोई भी पुण्य प्राप्त नहीं होगा। यही कारण है कि हमारे पौराणिक ग्रंथों ने भी माता-पिता की पूजा-सेवा को समस्त धार्मिक अनुष्ठानों से सर्वोपरी बताया है।
महादेव शिव परिवार की एक घटना माता-पिता के महत्व को प्रतिपादित करने हेतु सर्वमान्य है। एकबार देवताओं ने अमृत से एक दिव्य लड्डू बनाकर उसे माता पार्वती को दिया। दिव्य लड्डू को देखकर बालक कार्त्तिकेय एवं गणेश ने उसे प्राप्त करना चाहा। माता पार्वती ने पुत्रों से कहा कि तुम्हारे पिताजी एवं मेरी इच्छा है कि इस लड्डू का विभाजन न किया जाए। हम तुम बच्चों की एक जाँच परीक्षा लेना चाहते हैं, जो भी उसमें उत्तीर्ण होगा, यह लड्डू उसे प्रदान किया जाएगा। माता पार्वती ने कहा कि तुम दोनों बालकों में से जिसका धर्म सबसे बढ़कर होगा, उसी को यह दिव्य लड्डू दिया जाएगा। यह सुनते ही बालक कार्त्तिकेय अपने वाहन मयुर वाहन पर सवार होकर तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। उन्होंने यह सुन रखा था कि तीर्थयात्रा से मिलने वाला धर्म अतुलनीय होता है। उधर गणेशजी ने निर्णय लिया कि वह अपने माता-पिता की परिक्रमा करेंगे, क्योंकि माता-पिता की परिक्रमा मात्र से तीर्थयात्रा का सारा पुण्य मिल जाता है। फलतः बालक गणेश ने झटपझ अपनी माता पार्वती एवं पिता महादेव शिव को प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा लगाई। जब कार्त्तिकेय तीर्थयात्रा से लौटे तो माता पार्वती ने अपना निर्णय सुनाते हुए कहा- ÷÷सभी तीर्थों में स्नान, सभी देवों की पूजा, समस्त यज्ञों एवं समस्त व्रतों से बढ़कर माता-पिता की पूजा होती है। माता-पिता की पूजा की अतुलनीय है। अतः यह लड्डू गणेश को मिलेगा। माता-पिता को ही अपना सर्वस्व मानकर उनकी प्रदिक्षणा कर पूजा करने वाले श्रीगणेश इसी कारण देवताओं में अग्रपूज्य हुए।”


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