धार्मिक स्थलों की गलियों और रास्तों को पीकदान न बनाएँ
भारत के अनेक धर्मिक स्थलों में पान, गुटका, तम्बाकू, चाट, चटपटी तथा खाने-पीने की अनेक वस्तुएँ हर समय उपलब्ध् रहती हैं। तीर्थयात्री ऐसी सामग्रियाँ बड़े ही चाव से खाते-पीते हैं। बड़ी दुकानों में तो कूड़ादान की व्यवस्था होती है। किन्तु छोटी दुकानों में कूड़ादान अंतिम साँसें गिन रहा होता है। फलस्वरूप जूठन, दोना-पत्तल और चाय की प्यालियाँ सड़कों और गलियों पर रुलती रहती हैं। मिट्टी के जूठे बर्त्तन तीर्थयात्रियों के पाँवों और वाहनों की ठोकर से इधर-उधर लुढ़कर अंततः सड़कों पर ही चकनाचूर हो जाते हैं। और तो और नालियों का गंदा पानी सड़कों और गलियों को सींचता रहता हे, जिसपर तीर्थयात्रियों को सम्भल-सम्भल कर चलना पड़ता है। पान, गुटका, तम्बाकू खाने वालों के लिए तो सड़कें ही पीकदान का काम करती हैं। पान, गुटका, तम्बाकू खाने वाले यत्र-तत्र-सर्वत्र थूकते रहते हैं। पान की थूक से तो सड़कें लाल हो जाती हैं।
धूम्रपान करने वाले माचिस की तीलियाँ और सिगरेट के अवशेष बीच सड़कों पर ही फैंक देते हैं। कुछ युवा किस्म के सिगरेट प्रेमी तो अपने जूतों से सिगरेट की को पीच कर बूझाते हुए स्वयं को किसी फिल्मी अभिनेता सा अनुभव करते हैं। जो लोग सिगरेट को बुझाकर नहीं फैंकते हैं, सिगरेट ऐसे जलते हुए टुकड़े नंगे पाँव चलने वालों के पाँवों को जलाने से नहीं चूकते हैं। हिन्दू धर्म में चमड़े की वस्तुएँ बेल्ट, बैग, जूते-चप्पल आदि लेकर मंदिर में प्रवेश करना वर्जित माना जाता है। इसी कारण अपने निवास स्थान से भक्त नंगे पाँव ही मंदिर तक आते-जाते हैं।
जब कोई व्यक्ति सड़क पर अथवा चलते हुए वाहन में बेठे-बैठ थूकता है, तो उसपर गुस्सा उतारते हुए ‘बिहारी’ की गाली दी जाती हे। वस्तुतः आम हिन्दुस्तानियों की यही सोच है कि बिहार राज्य के रहने वाले बिहारी थूकने की प्रक्रिया में प्रथम होते हैं। ऐसा समझने वाले वस्तुतः बहुत बड़ी भूल करते हैं। बिहार में सड़कों को वर्ष में कम से कम दोबार वही बिहारी अपने हाथों से स्वच्छ करते हैं, जिन्हें थूकने के लिए अपमानित किया जाता है। छठ पूजा के समय बिहार की प्रत्येक गली और सड़क को जिसपर चलकर छठ पूजा करने वाले भक्त किसी नदी और तालाब तक नंगे पाँव जाते हैं, उन्हें उन्हीं बिहारियों द्वारा धोया जाता है। सड़कों और गलियों को धेने का ऐसा उदाहरण भारत के किसी अन्य भाग में देखने को नहीं मिलता है।
भारत के अनेक तीर्थ स्थलों में पैदल, दंडवत और पेटपलनिया करने करते हुए अपने आराध्य के दर्शन करने की मान्यता है। वैद्यनाथधाम देवघर झारखंड में प्रतिवर्ष हजारों शिव भक्त दंडवत करते हुए देवघर भोलेनाथजी के दर्शन कर अपनी मनोकामनाएँ पूर्ण करनाने आते हैं। खाटूधम राजस्थान में भी हजारों श्याम प्रेमी प्रतिवर्ष पेट पेटलनिया करते हुए श्याम मंदिर तक आते हैं। खाटूधाम की गलियाँ यद्यपि साफ-सूथरी होती हैं, किन्तु पेटपलनिया करने वाले जानते हैं, कि उन्हें गलियों में पेटपलनिया करते समय थूक ओर गंदगी का सामना करना पड़ता है।
धर्मिक स्थलों में सड़कों और गलियों को कूड़ादान बनाने के लिए कौन जिम्मेवार हैं? आने वाले तीर्थयात्री, स्थानीय निवासी या सफाई कर्मचारी? शहर, गाँव की सफाई तो प्रतिदिन होती है, और गंदगी भी प्रतिदिन होती है। इसमें कोई दो मत नहीं है कि पान, गुटका, तम्बाकू खाकर यात्र-तत्र थूकने वाले, जूठे दोने-पत्तल सड़कों पर डालने वाले, और जलती सिगरेट को सड़कों और गलियों पर पर फैंकने वाले इस अपराध के लिए जिम्मेवार माने जा सकते हैं। दुकानदारों को भी चाहिये कि वह अपनी दुकानों के में कूड़ादान, पीकदान आदि लगाएँ। सफाई कर्मचारियों को चाहिये कि वह इतनी अधिक सफाई रखें कि उस स्वच्छता को देखकर वहाँ गंदगी डालने की सोच भी न सकें। विशेषकर तीर्थयात्रियों को सफाई की व्यवस्था हेतु एक अलग से स्वच्छता समिति बनाई जानी चाहिये जो विशेष पर्वों, आयोजनों और अवसरों पर सड़कों व गलियों की स्वच्छता की विशेष व्यवस्था करें।
दिल्ली में धर्मिक आयोजनों में जूता सेवा को सबसे बड़ी सेवा माना जाता है। जूता सेवा अर्थात आगन्तुक भक्तों के जूतों को स्वयं भक्तों द्वारा अपने हाथों से सम्भाल कर रखना और दर्शन-पूजनकर लौटते समय अपने हाथों से ही उन्हें लौटना। जूता सेवा की ही तरह सड़क एवं गली सफाई सेवा की भी व्यवस्था भक्तों को करनी चाहिये। थोड़ी-थोड़ी दूर पर स्वयं सेवकों को तैनात करना चाहिये जिससे वह पान, गुटका, आईसक्रीम, आदि खाने वालों और थकने वालों को सड़क पर थूकने से मना करें। और किसी ने थूक दिया तो उसे अपने हाथों से साफ करें। थूकने और गंदगी फैलाने वाले के सामने ही जब कोई भक्त स्थान को स्वच्छ करेगा तो गंदगी फैलाने वाले लज्जित होकर भविष्य में अपनी भूल को दोहराने से परहेज करेंगे।
खाटूधाम में प्रतिवर्ष बड़े-बड़े भंडारे लगाए जाते हैं। भंडारों में भक्तों द्वारा जूठे ग्लास, दोने आदि सड़क पर डाल दिए जाते हैं। पदयात्रियों को ऐसी जूठन पर ही चलना पड़ता है। तीर्थस्थलों में जूठन, थूक आदि की समस्या को भक्तों द्वारा स्थानीय निवासियों की मदद से सुधरा जा सकता है।
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