श्री गणेशाय नम: :: श्याम प्रभु खाटू वाले का मुख्य समाचार पत्र ::


4. कूष्मांडा :

September 12th, 2009 admin Posted in Uncategorized | No Comments »

सुरासम्पूर्णकलशं रुधिराप्लुतमेव च।

दधना हस्तपद्माभ्यां कूष्मांडा शुभदास्तु मे॥

   परिचय : माता दुर्गा का चौथे स्वरूप का नाम माँ कूष्मांडा है।  संस्कृत में कूष्माण्ड ‘कुम्हड़े’ को कहा जाता है। माता को कूम्हड़े की बली अधिक प्रिय है, यही कारण है कि इन्हें ‘माँ कूष्मांडा’ कहा जाता है। नवरात्रि के चौथे दिन माता कूष्मांडा की पूजा करनी चाहिये।

स्वरूप : माता कूष्मांडा का निवास सूर्यलोक के अंदर के लोक में है। सूर्यलोक में निवास करने की शक्ति एवं क्षमता केवल माता कूष्मांडा में ही है। माता कूष्मांडा की कान्ति सूर्य के समान की देदीप्यमान है। माता कूष्मांडा की आठ भुजाएँ है। सात हाथों कमण्डलु, धणुष, बाण, कमल पुष्प, अमृत कलश, चक्र तथा गदा सुशोभित हैं। आठवें हाथ में समस्त सिद्धियों और निधियों को प्रदान करने वाली जपमाला शोभायमान है। माता कूष्मांडा का वाहन सिंह है।   

महात्म्य : माता कूष्मांडा की भक्ति, पूजा एवं उपासना करने से भक्तों के समस्त रोग-शोक विनिष्ट हो जाते हैं। माता कूष्मांडा की भक्ति अराधना करने से आयु, यश, बल की भी वृद्धि होती है। सूर्य के मध्य भाग में निवास करने वाली माता कूष्मांडा अपने भक्तों के समस्त अंधकारों का भी विनाश करती हैं। अपने भक्तों में ज्ञान का प्रकाश भरने वाली, सुख, समृद्धि एवं अरोग्य प्रदान करने वाली माता कूष्मांडा को मैं मन, वचन, वाणी, कर्म से बारम्बार नमस्कार करता हूँ।

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3. चन्द्रघंटा :

September 12th, 2009 admin Posted in Uncategorized | No Comments »

पिण्डजप्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्राकैर्युता।

प्रसादं तनुते मह्यं चन्द्रघण्टेति विश्रुता॥    

परिचय : माँ दुर्गा की तीसरी शक्ति ‘चन्द्रघंटा’ है। नवरात्रिा के तीसरे दिन माँ दुर्गा के इसी स्वरूप की अर्चना करनी चाहिये।  माता के घंटक की धवनि सुन दानव, दैत्य, राक्षस आदि सदैव भयातुर रहते हैं।

स्वरूप : माँ चन्द्रघंटा का स्वरूप परम शांतिदायक एवं कल्याणकारी है। माता के मस्तक पर घंटे के आकार को अर्धचन्द्र शोभायमान है, इसीकारण इन्हें चन्द्रघंटा कहा जाता है। माता के शरीर का रंग स्वर्ण के समान चमकीला है। माता चन्द्रघंटा के दस हाथों में खड्ग, बाण, धनुष, त्रिशूल, तलवार, गदा, कमण्डलु, कमल, आदि शोभित हैं। सिंह के आसन पर विराजमान माता चन्द्रघंटा की हर समय युद्ध हेतु उद्यत दिखती हैं।

महात्म्य : माता चन्द्रघंटा की अराध्ना करने अलौकिक वस्तुओं के दर्शन होते हैं, दिव्य सुगन्धियों का अनुभव होता है और दिव्य ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। माता चन्द्रघंटा युद्ध हेतु सदैव तत्पर रहती हैं यही कारण है कि माता के सम्मुख जैसे ही कोई भक्त प्रस्तुत होता है माता उसके रोग, शोक, भय, काम, क्रोध, अहंकार, मद आदि दैत्यों का नाश कर देती हैं। अपने भक्तों में वीरता, निर्भयता, सौम्यता, विनम्रता, आदि भाव प्रगट करने वाली माता चन्द्राघंटा को मैं मन, वचन, वाणी, कर्म से परिशुद्ध होकर बारम्बार नमस्कार करता हूँ।

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2. ब्रह्मचारिणी :

September 12th, 2009 admin Posted in Uncategorized | No Comments »

2. ब्रह्मचारिणी :

दधना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।

देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तामा॥ 

     परिचय : माँ दुर्गा का द्वितीय स्वरूप ‘ब्रह्मचारिणी’ है। यहाँ ब्रह्म शब्द का अर्थ ‘तपस्या’ है, अर्थात ‘तप’ का आचरण करने वाली माता। देवी ‘सती’ द्वारा अपने पिता राजा दक्ष द्वारा अपने पति भगवान भोलेनाथजी को न बुलाये जाने के कारण अपमानित एवं क्रुद्ध सती ने स्वयं को भष्म कर लिया था। अगले जन्म यही ‘सती’ हिमालय के घर जन्म लेकर ‘शैलपुत्रदी’ नाम से प्रसिद्ध हुईं। नारदजी की प्रेरणा से भगवान श्रीश्री शिवशंकरजी को पति रूप में प्राप्त करने हेतु अत्यंत ही कइिन तपस्या की थी। हिमालय पुत्री ने एक हजार वर्ष तक फल-मूल खाकर, सौ वर्षों तक शाक ग्रहण कर, कुछ दिनों तक आकाश के नीचे वर्षा और धूप सहकर कठोर उपवास किया। तत्पश्चात इन हिमालय पुत्राी ने तीन हजार वर्षों तक ध्रती पर गिरे हुए बेलपत्रों को खाकर महादेव की अराध्ना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने गिरे हुए बेलपत्रों को भी खाना छोड़ दिया। उन्होंने निर्जल और निराहार रहकर कठोर तपस्या की। देवी ने जब सूखे बेलपत्रों को भी ग्रहण करना छोड़ दिया तो उनका नाम ‘अर्पणा’ पड़ा। ऐसे महा कठिन को करने के कारण ही देवी का नाम ‘तपश्चारिणी’ अर्थात ‘ब्रह्मचारिणी’ पड़ गया। कठोर तप के कारण अपने शरीर को क्षीण एवं कृशकाय कर चुकी देवी से उनकी माता ‘मेना’ (हिमालय पत्नी) ने देवी को पुकार- ”उ-मा, अरे! नहीं! ओह!!” तभी से ब्रह्मचारिणी देवी का एक नाम ‘उमा’ हो गया। ब्रह्मचारिणी के इस कठोरतम तप से तीनों लोकों में देवी की सराहना होने लगी। ब्रह्माजीनेक आकाशवाणी करके देवी को मनोवांछित अर्थात शिवजी को पति रूप में पाने का वर शीघ्र प्राप्त करने की घोषणा की।

स्वरूप : माँ ब्रह्मचारिणी का स्वरूप ज्योतिर्मय एवं अत्यंत ही भव्य है। माता ब्रह्मचारिणी के हाथों में जप की माला एवं कमण्डलू शोभायमान है।    

महात्म्य : माता ब्रह्मचारिणी का यह स्वरूप भक्तों और सिद्धकों को अनन्त सुफल देने वाला है। माता ब्रह्मचारिणी के इस स्वरूप की उपासना से तप, त्याग, वैराग्य, सदाचार, संयम की वृद्ध करने वाली और भक्तों को सर्वत्रा सिद्ध एवं विजय दिलाने वाली माता ब्रह्मचारिणी को मैं शत-शत नमन करता हूँ।

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1. शैलपुत्री

September 12th, 2009 admin Posted in Uncategorized | No Comments »

1. शैलपुत्री :

वन्दे वाछितलाभाय चन्द्रार्धतशेखराम्।

वृषारूढ़ां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥      

परिचय : माँ दुर्गा का प्रथम स्वरूप ‘शैलपुत्री’ है। अपने पिता राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में अपने पति भगवान श्रीश्री शंकर को न बुलाने और अपमानित करने के बाद जब शिवपत्नी ‘सती’ ने  स्वयं को यज्ञकुंड में आहूत कर भस्म कर दिया था।  अगले जन्म यही ‘सती’ हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्मी अर्थात इनका नाम ‘शैलपुत्री, पार्वती व हैमवती’ पड़ा। इस जन्म में भी इनका विवाह भगवान भोलेनाथजी के संग ही हुआ।

स्वरूप : शिवजी की ही भाँति वृषभ वाहन पर आरूढ़ माँ शैलपुत्री के दाँये हाथ में त्रिशूल एवं बाँये हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। माता का यह स्वरूप सभी गर्व का दमन करने वाला है।    

महात्म्य : माता दुर्गा ‘शैलपुत्री का महत्व और इनकी शक्तियाँ अनन्त हैं। उपनिषदों के अनुसार माता शैलपुत्री ने हैमवती स्वरूप में अनेकों देवताओं का गर्व भंग किया है। अर्थात माँ शैलपुत्री किसी के गर्व को सहन नहीं कर पाती है। ऐसी महादेवी मुझ अबोध् बालक का गर्व समाप्त कर अपनी कृपा से अभिभूत करें। माता शैलपुत्री को कोटि-कोटि नमन है।

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नवदुर्गा

September 12th, 2009 admin Posted in Uncategorized | No Comments »

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प्रिय भक्त पाठकों! जय श्री श्याम!!हम शिवपत्नी माँ भगवती के नौ स्वरूपों का संक्षिप्त परिचय प्रकाशित कर रहे हैं। नवरात्रि का पर्व साल में दो बार आता है। आश्विन और चैत्र महिनों में आने वाले नवरात्र पर्व पर आप प्रतिदिन माता के स्वरूपों की अराधना उनके इन प्रकाशित लेखों को पढ़कर करें! जैसे माता की जोत लेने के पश्चात और आरती गाने से पूर्व माता की स्तुति इस लेख को पढ़कर करें-

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Hello world!

April 1st, 2008 admin Posted in Uncategorized | No Comments »

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