श्री श्याम मनुहार महोत्सव में हजारों श्याम भक्तों ने हिन्दुस्तानी राग-रागनियों से भरपूर भक्ति रसगंगा में डुबकी लगाई

इतिहासकार श्री देवेन्द्र कुमार शर्मा जोशीजी की लेखनी से :-
खाटूश्यामजी के इतिहास की यह पहली घटना है जिसमें श्री श्याम प्रभु से उनके ही मंदिर विस्तार हेतु उन्हीं के 290 वर्ष पूर्व बने भवन के विस्तार हेतु देश के अनेक प्रान्तों से आये भजन गायकों ने बाबा को रिझाने हेतु उन्हीं के श्री चरणों में श्री श्याम मनुहार महोत्सव का आयोजन कर, सम्पूर्ण खाटूनगरी को बाबा के तुमुल जयघोषों से गुँजायमान कर डाला। यह एक विचित्र घटना इसलिये है कि अबतक करोड़ों की संख्या में भक्त श्री श्याम बाबा से अपने लिये याचना करने आते रहे हैं। ‘लखदातार की जय’ का उद्घोष इन्हीं भक्तों की स्वारथ सिद्ध भावना को ही उजागर करती है। परन्तु पहलीबार हजारों भक्तों ने एकजुट होकर समस्त समाज के कल्याणार्थ अर्थात एक दूसरे की सुविधार्थ श्री श्याम प्रभु से श्याम मंदिर के विस्तार हेतु मनुहार की।
श्री बालाजी बाल परिवार मण्डल (ग्वालियर) द्वारा आयोजित श्री श्याम मनुहार महोत्स्व का शुभारम्भ शास्त्रीय भजन गायक श्री संजय प्रभाकर ने शास्त्रीय राग-रागनियों के साथ किया। उन्होंने ‘म्हें गणपत नै प्रथम मनावाँ-श्री श्याम मनुहार महोत्सव माँही’ राग शुद्ध कल्याण में तीनताल में श्रीगणेश वन्दना ज्योंहि आरम्भ की, उपस्थित भक्तगणों के मुख से इनके स्वरों में स्वर जुड़ गये और अनेकों प्रेमी नृत्य करने में संलग्न हो गये। इसके बाद उन्होंने राग चारूकेशी- ताल कहरवा में ‘हे महावीर संकटमोचन! सनले अरज हमारी’ पद गाया तो समूचा पंडाल श्री हनुमानजी की भक्ति से सराबोर हो गया।
तत्पश्चात श्री संजय प्रभाकर ने राग भीमपलासी में तीनताल में आबद्ध ‘श्याम शरण नित रहना मनवाँ’ एवं राग दरबारी में झपताल में स्वरबद्ध ‘प्रभुजी! हार शरण तोरी आया’ पद रचनाएँ प्रस्तुत कीं। यह सभी श्याम भक्ति स सराबोर पद रचनाएँ सबसे अलग एवं विलक्षण थीं। अंत में उन्होंने शुद्ध स्वरों में प्रख्यात साहित्यकार श्री नरेश शांडिल्य रचित ‘श्याम सपनों में मेरे भी आये सखि’ गाया। इस पद रचना उपस्थित भक्तों को इतनी अधिक भाई की अनेक प्रेमी तो मंच पर पहुँचकर नृत्य करने लगे। ‘श्याम सपनों में मेरे भी आए सखि’ सुनकर सभी श्रोता उपने आराध्य देव की मधुर स्मृति के स्वप्न लोक में खो गये। मैंने अपने 63 वर्षों के जीवनकाल में श्री श्याम दरबार में आजतक ऐसी संगीत सभा का आयोजन न सुना और ना ही देखा।“
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