श्री गणेशाय नम: :: श्याम प्रभु खाटू वाले का मुख्य समाचार पत्र ::


स्तन कैंसर ठीक हुआ खाटू श्यामजी में नि:शुल्क दवा ली थी

August 26th, 2010 admin Posted in रोचक कथाएँ | No Comments »

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श्री हनुमानजी की चालीसा में गोस्वामी तुलसीदासजी ने श्री हनुमानजी की महिमा का वर्णन करते हुए लिखा था-

”नासै रोग हरै सब पीरा, जपत निरन्तर हनुमत बीरा॥”

यह उक्ति श्री श्याम बाबा खाटू वाले की महिमा में भी शत प्रतिशत सही बैठ रही है। जो लोग श्री श्याम बाबा खाटू वाले में सम्पूर्ण और सच्ची आस्था रखते हैं उनके भी सभी रोग और सभी पीड़ाएँ नष्ट हो जाती हैं। श्री श्याम संसार ने कुछ महिने पहले खाटूश्यामजी श्री श्याम प्रभु के आशीर्वाद से दाँता ग्राम की एक वयोवृद्ध महिला श्रीमती भँवरी देवी का स्तन कैंसर ठीक हो जाने का समाचार प्रकाशित किया था। 22 जून 2010 को सम्पादक ने श्री श्याम सतसंग भवन (मुम्बई) में चल रहे नि:शुल्क चिकित्सालय में सुविख्यात होमियोपैथी चिकित्सक डॉ. के. के. कौशिक के सान्निध्य में श्रीमती भँवरी देवी एवं उनके सुपुत्रों से बात की। श्री लालचंद ठेकेदार की माताजी श्रीमती भँवरी देवी ने बताया कि उनके स्तन में गाँठ हो गई थी। वह इस गाँठ से बहुत ही व्याकुल रहती थी। बेचैनी के कारण वह सो भी नहीं पाती थी। वह अपना ईलाज कराने चोमूँ के बराला हॉस्पीटल गई। वहाँ डॉ. बूलालजी ने उनका मुआयना किया और उन्हें जयपुर के सवाई मानसिंह हॉस्पीटल में ईलाज करवाने की सलाह दी। सवाई मानसिंह हॉस्पीटल में डॉ. सोंगरा ने स्तन कैंसर की पुष्टि की और श्रीमती भँवरी देवी का एक वर्ष तक ईलाज किया। विशेष लाभ ने मिलने पर उन्होंने उन्हें कैंसर हॉस्पीटल जयपुर रैफर कर दिया। स्तन की गाँठ से श्रीमती भँवरी देवी की पीड़ा को असहनीय हाती जा रही थी। श्रीमती भँवरी देवी ने अपनी पीड़ाओं को याद करते हुए बताया कि असहनीय दर्द के कारण वह तीन महिने तक सोई नहीं, दिन रात बैठी ही रहती थी। कैंसर हॉस्पीटल जयपुर के स्तन कैंसर विशेषज्ञों ने भी अपने हाथ खड़े करते हुए कहा कि उनके पास जितनी शक्ति थी, उन्होंने सारी झौंक दी, अब हम कुछ नहीं कर सकते।

हारी-मारी दुखी और निराश श्रीमती भँवरी देवी, उनके पतिदेव श्री तुलसीरामजी अपनी धर्मपत्नी एवं उनके दो सुपुत्र श्री लालचंद ठेकेदार और श्री गौरीशंकर सिंह अपनी माँ की इस पीड़ा से अत्यंत ही दुखी थे। श्री लालचंद ठेकेदार खाटूश्यामजी में धर्मशालाओं के निर्माण की ठेकेदारी करते हैं। श्री श्याम सतसंग भवन (मुम्बई) में उनका आना-जाना था। एक दिन उनहोंने श्री श्याम सतसंग भवन के मुनीम श्री ओमजी शर्मा को अपना दुखड़ा सुनाया। श्री ओमजी शर्मा ने श्री श्याम श्याम प्रभु का धयान रखते हुए श्री लालचंद ठेकेदार को श्री श्याम सतसंग भवन में प्रति शुक्ल एकादशी तिथि को चलने वाले नि:शुल्क चिकित्सालय के बारे में बताते हुए कहा कि यहाँ श्री श्याम बाबा की कृपा से हर प्रकार की गम्भीर से गम्भीर रोगों का नि:शुल्क ईलाज किया जाता है।

2010 के माघ महिने की शुक्ल एकादशी अर्थात 26 जनवरी को श्री लालचंद ठेकेदार अपनी माताजी को लेकर खाटूश्यामजी आए। श्री श्याम प्रभु के दर्शन कर वह डॉ. के. के. कौशिक से मिले। प्रख्यात होमियापैथी चिकित्सक डॉ. के. के. कौशिक ने श्री श्याम बाबा का नाम लेकर श्रीमती भँवरी देवी के स्तन कैंसर की गाँठो को समाप्त करने हेतु नि:शुल्क दवा दी। श्रीमती भँवरी देवी फाल्गुन की ग्यारस को भी खाटूधाम आई थीं, गाँठे हल्की पाई गईं। अब वह दिन रात बैठकर नहीं सो कर गुजारने लगी। गाँठों की पीड़ा को श्री श्याम प्रभु अनवरत हर हरने लगे। 22 जून 2010 को सम्पादक श्री संजय प्रभाकर ने पाया कि श्रीमती भँवरी देवी का वह कैंसर जिसके लिये जयपुर के कैसर हॉस्पीटल ने भी अपने हाथ खड़े कर दिये थे, समाप्त प्राय हो चुका है। श्रीमती भँवरी देवी अब प्रत्येक शुक्ल ग्यारस को खाटूश्याम बाबा के दर्शन करती है, उन्हें कोटि-कोटि धन्यवाद देते हुए यही कहती है- ”हे श्याम बाबा! श्री श्याम सतसंग भवन (मुम्बई) में असाध्य रोगों का ईलाज तेरी कृपा से डॉ. कौशिक एवं उनकी पूरी टीम इसी प्रकार से करती रहे, जैसे मेरे रोग को आपने दूर किया है।“

वर्तमान समय में श्री श्याम सतसंग भवन (मुम्बई) में डॉ. के. के. कौशिक (दिल्ली) के अतिरिक्त डॉ. चन्द्रमणी शर्मा (साहिबाबाद, गाजियाबाद) एवं सहयोगी श्री यशदीप शर्मा, श्री अंकुश जैन एवं श्री वैभव शर्मा प्रत्येक महिने की शुक्ल कएादशी को श्याम भक्तों की सेवा में ही श्री श्याम प्रभु की अराधना और भक्ति का पुण्य प्राप्त कर रहे हैं।

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आलू सिंहजी ने श्याम कृपा से ऑंखें वापस दिलाईं (श्री श्याम खाटू वाले का चमत्कार)

September 13th, 2009 admin Posted in रोचक कथाएँ | No Comments »

ब्रह्मलीन आलूसिंहजी महाराज श्याम बाबा खाटू वाले के अनन्य भक्तों में से एक हैं। 1963 ई. में श्याम भक्त श्री मुरारीलाल अग्रवाल का बेटा प्रमोद अग्रवाल घर की छत से सिर के बल गिर गया। बच्चे की ऑंख पर गहरी चोट लगी थी। परिवार वाले घबरा गए। इस दिन धन त्रयोदशी थी। उसे हॉस्पीटल ले जाया गया। बच्चे को फगवाड़ा के बड़े से बड़े डॉक्टर को दिखाया गया। कुछ दिन ऑंख का ईलाज चला, किन्तु किसी प्रकार का कोई लाभ नहीं किन्तु बालक ही हालत देखकर प्रत्येक डॉक्टर ने उन्हें जवाब दे दिया। डॉ. नम्बूदरीपाद (सीएमसी), डा. प्रिंकन, एवं डॉ. रम्बो सभी ने बच्चे का ईलाज करने से साफ मना कर दिया। उन्होंने कहा कि बच्चे की ऑंख ठीक होने की सम्भावना ना के बराबर है।

श्याम भक्त श्री मुरारीलाल अग्रवाल की धर्मपत्नी श्रीमती लक्ष्मीदेवी को तत्काल हारे के सहारे श्री श्याम खाटू वाले की याद आ गई। उन्होंने डॉक्टरों से कहा कि मेरे पोते को आप इसी हालत में छुट्टी दे दीजिए। हम अपने बच्चे को अपने डॉक्टर को दिखने ले जाएँगे। वह अपने बच्चे को लेकर सीधे खाटूधाम आ गई।

इस घटना के ठीक एक महिने बाद त्रयोदशी के दिन खाटू धाम में उन्होंने बाबा के समक्ष अपने बच्चे को सौंपते हुए कहा कि बाबा अब तू ही मेरे बच्चे की ऑंखें ठीक करेगा। त्रयोदशी के दिन मंदिर प्रांगण में श्याम भक्त आलू सिंहजी महाराज भक्ति भाव से संकीर्तन में व्यस्त थे। तभी लक्ष्मीदेवी ने अपनी श्याम भक्ति के बल पर दरबार में कहा कि बाबा आज मैं अपने पोते की खराब हो गई ऑंखें ठीक करा कर ही लौटूँगी या फिर यहीं अपने प्राण त्याग दूँगी।संकीर्तन में लिप्त आलू सिंहजी महाराज ने उस बच्चे का हाथ पकड़ कर उसे दरबार की आरे ले जाने का प्रयास किया।

ठीक उसी समय एक ऐसी घटना घटी जिसने उस बालक, आलू सिंहजी महाराज एवं श्री श्याम बाबा के बीच एक व्यवधान सा खड़ा कर दिया। वहीं बैठी एक महिला ने आलू सिंहजी को अपने निकट देख, उनके पैर पकड़ लिए। वस्तुत: वह महिला भी किसी कारण से दुखी थी और आलू सिंहजी के माध्यम से अपना कष्ट दूर करवाना चाहती थी। उस महिला को यह पता नहीं चल पाया था कि उस समय आलू सिंहजी महाराज उस बालक जिसकी ऑंखें छत से गिर जाने के कारण खराब हो गईं थीं, को श्री श्याम कृपा से ठीक करने वाले थे, के लिए पूर्ण रूप से आवेशित हो चुके हैं। महिला द्वारा डाले गए अनायास व्यधान के तत्काल बाद आलू सिंहजी महाराज ने उसे फटकारते हुए कहा-”रांड एक को तो काम हो जा न देती?” कहा जाता है कि यदि उस महिला ने बीच में टोका नहीं होता तो ओम प्रकाशजी के बेटे प्रमोद की ऑंखें उस समय ही श्री श्याम कृपा से शत प्रतिशत ठीक हो जातीं। महिला द्वारा डाले गए व्यवधान के पश्चात जब वह बालक आलू सिंहजी महाराज द्वारा दरबार में लाया गया तो उसने उसी क्षण अपनी आखों से देखना प्रारम्भ कर दिया।

इस दैवीय घटना के पश्चात श्री ओमप्रकाशजी अग्रवाल अपने बेटे को लेकर दिल्ली में राजपुर रोड स्थित तीरथ शाह अस्पताल में आए। यहाँ न्यूरो सर्जन डॉ. बलदेव सिंह ने बालक की ऑंखों को टेस्ट करने हेतु उसकी ऑंख पर टार्च की रोशनी डाली, तो बालक ने टार्च पर अपना हाथ रख दिया। अर्थात जिन डाक्टरों ने प्रमोद को अंधा घोषित कर यह कह दिया था कि वह देख नहीं सकता है, श्री श्याम खाटू वाले की कृपा से बालक ने सब कुछ देखा। श्री प्रमोद कुमार आज भी अपनी ऑंखों से श्री श्याम छवि को निहारते हैं। यह बात अलग है कि उनकी ऑंखें शत प्रतिशत ठीक नहीं हो पाईं।

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भागवत के प्रमुख पात्र - जब श्रीकृष्ण मथुरा के पास एक गुफा में छुप गए थे

June 21st, 2008 admin Posted in रोचक कथाएँ | No Comments »

महाराजा मुचुकुन्द सूर्यवंश के प्रतावी राजा मान्धता के सुपत्रा थे। महाराजा मुचुकुन्द अपने समय के सबसे प्रतापी राजा थे। उनके बल एवं पराक्रम की बराबरी करने वाला पृथ्वी पर उस समय दूसरा कोई नहीं था। उन दिनों देवता मुचुकुन्द से सैन्य सहायता लेने को उतावले रहते थे। एकबार जब देवताओं का असुरों के संग भयंकर संग्राम हुआ तो देवताओं ने महाराजा मुचुकुन्द से देवताओं का सेनापति बनने का आग्रह किया। देवताओं की प्रार्थना सुनकर महाराजा मुचुकुन्द ने देवलोक जाकर असुरों से घोर युद्ध किया और उसमें सफलता भी पाई। आगे चलकर शिव सुपुत्र भगवान कार्त्तिकेय को देवताओं का सेनापति बनाया गया। तदन्तर देवराज इंद्र ने महाराजा मुचुकुन्द से प्रार्थना पूर्वक कहा-राजन्‌! आपने देवताओं की बड़ी सेवा की है। आपने स्त्री, पुत्र और अपना राज्य छोड़कर हम देवताओं की रक्षा में हजारों वर्ष बिताए हैं। आपकी इस सेवा से हम देवता आपसे विशेष प्रसन्न हैं। मोक्ष के अतिरिक्त आप हमसे कुछ भी मांग लीजिए हम आपको देने हेतु तत्पर हैं।’
असुरों के साथ अनवरत युद्ध करते रहने के कारण महाराजा मुचुकुन्द को सोने का अवसर नहीं मिला था। अतः उन्होंने देवराज से इंद्र से दीर्घकालन निद्रा का वरदान मांगते हुए कहा कि जो भी मेरी निद्रा में विन डाले वह तकल जलकर भष्म हो जाए।
इंद्र से यह अद्भुद वरदान प्राप्त कर महाराजा मुचुकुन्द पृथ्वी पर लौट आए और मथुरा नगरी के पास ही एक शांत गुफा में सो गए। द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो इस बात का पता अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण को स्वभावतः था। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने असुरराज कालनेमी को अपने पीछे भागने को विवश कर दिया। आगे-आगे श्रीकृष्ण, पीछे-पीछे असुर कालनेमी। कालनेमी से बचते-बचते श्री कृष्ण उसी गुफा के अंदर आकर छुप गए जिसमें महाराजा मुचुकुन्द गहन निद्रा ले रहे थे। लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने चुपके से अपना पीताम्बर महाराजा मुचुकुन्द के उपर रख दिया। भगवान का पीछा करते-करते राक्षस कालनेमी उसी गुफा के अंदर प्रवीष्ट हुआ। उसने पीताम्बर ओड़े सो रहे महाराजा मुचुकुन्द को श्रीकृष्ण समझकर उनपर लात से प्रहार किया। इससे महाराजा मुचुकुन्द की निद्रा टूट गई। आँख खुलते ही उन्होंने अपने समक्ष राक्षस कालनेमी को देखा। कालनेमी तत्काल ही भस्म हो गया। वस्तुतः श्रीकृष्ण असुर कालनेमी को उस गुफा के अंदर महाराजा मुचुकुन्द द्वारा भस्म करवाने के उद्देश्य से लाना चाहते थो।
कालनेमी के भस्म होते ही भगवान श्रीकृष्ण महाराजा मुचुकुन्द के सामने प्रगट हुए। भगवान ने अपने शरीर पर पीतम्बर, कौस्तुभ मणी, धारण कर रखा था। उनकी चार भुजाएँ थीं। मेघ वर्ण श्याम स्वरूप श्रीकृष्ण को अपने समक्ष देखकर महाराजा मुचुकुन्द भावविभोर हो गए। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की और उनसे अनन्य भक्ति उपासना का वरदान मांगा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-राजन यह कालनेमी असुर मेरी प्रेरणा से तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो गया। मुचुकुन्द तुम पहले ही मेरी अराधना कर चुके हो? मैं तुम्हें तुम्हारा अभिष्ट वर देता हूँ। तुम मेरी अनन्य भक्ति को प्राप्त करोगे। यह कहकार भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।

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भागवत के प्रमुख पात्र - वह फल बेचने वाली श्रीकृष्ण की प्रेमिका थी

June 21st, 2008 admin Posted in रोचक कथाएँ | No Comments »

फल ले लो, मीठे-मीठे फल ले लो’-गोकुल की गलियों में अक्सर एक महिला स्वर गूँजा करता था। फल बेचने वाली यह महिला चाहती थी कि भगवन श्री कृष्ण उससे फल खरीदने आएँ तो उसका जीवन ध्न्य हो जाए। भागवत में अनक पात्रों का चरित्र चित्रण किया गया गया है। किन्तु सुखिया नामकी मालिन की पात्रता सबसे अद्वितीय है। मथुरा में सुखिया नामकी एक मालिन थी। वह मीठे-मीठे फल बेचने के लिए प्रतिदिन गोकुल जाया करती थी। फल बेचने का तो एक बहाना था, वस्तुतः सुखिया हर समय भगवान श्रीकृष्ण से मिलने को उद्धत रहती थी। वह अपने मन बसी भगवान श्री कृष्ण की मूर्ति पर प्रतिदिन भावों के पुष्प अर्पित किया करती थी। श्री कृष्ण सुखिया के इस निश्छल प्रेम से परिचित थे, किन्तु वह उससे एक निर्धरित दूरी बनाकर रखते थे। श्रीकृष्ण से मिलने को आतुर मालिन सुखिया जब भी कभी भगवान के सम्मुख आने में सफल हो जाती थी, तो श्रीकृष्ण उसे देखकर खेलने के बहाने इधर-उधर चले जाते थे। ऐसे में सुखिया और अधिक व्याकुल हो जाया करती थी। वह मन ही मन श्रीकृष्ण से कहती थी-श्यामसुन्दर तुम इतने अधिक निष्ठुर क्यों हो? जो तुम्हें चाहते हैं, उनसे तुम दूर भागते हो और जो तुमसे वैर करते हैं उन्हें तुम अपने निकट बुला लेते हो? तुम्हारी लीला अत्यंत विचित्र है, तुम्हारी लीला को एकमात्र तुम्हीं समझ सकते हो!
भगवान श्री कृष्ण मालिन से ज्यों-ज्यों दूर होते जाते, मालिन की वेदना और भी अधिक बढ़ती जाती थी। श्रीकृष्ण से वियोग की विकलता मालिन सुखिया के लिए भगवान श्रीकृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करने का मार्ग सरल बना रही थी। यही कारण था कि मालिन गोकुल में सदैव श्रीकृष्ण के ईर्द-गिर्द फल बेचने के बहाने चक्कर लगाया करती थी। अब तो सुखिया श्रीकृष्ण के प्रेम में अपना सुध-बुध सबकुछ खो चुकी थी। उसे मनमाहेन के सिवा और कुछ भी नहीं सूझता था। वह फल बेचकर संध्या मथुरा लौट आती थी, पर उसका मन गोकुल में ही छूट जाता था। अगले दिन प्रातः काल वह पुनः गोकुल पहुँच जाती थी। मालिन सुखिया का श्रीकृष्ण प्रेम अपनी पराकाष्ठा पर पहुँचता जा रहा था। वह चाहती थी कि भगवान श्रीकृष्ण ग्राहक बनकर उससे फल खरीदने स्वयं आएँ, ताकि वह वह उनकी पतली-पतली उँगलियों का स्पर्श कर सके। मालिन को विश्वास था कि फल बेचने के बहाने जब भगवान श्रीकृष्ण का स्पर्श उसे मिलेगा तो उसका शरीर पावन हो जाएगा।
भगवान श्रीकृष्ण से मिलने की घड़ी निकट आने वाली थी। एक दिन सुखिया गोकुल में उस स्थान पर ‘फल लेलो-फल लेलो’ की आवाज लगा रही थी, जहाँ श्रीकृष्ण खेल रहे थे। अन्तर्यामी श्रीकृष्ण सबकुछ समझ रहे थे कि फल बेचेन के बहाने मालिन सुखिया उन्हें मिलने हेतु आवाज दे रही है। अपने दोनों करों में धन भरकर श्रीकृष्ण घर से निकल गए फल खरीदने हेतु। अब बालक श्रीकृष्ण सुखिया को निहार रहे थे और सुखिया श्रीकृष्ण को। यह क्या, श्रीकृष्ण के हाथों से सारा धन धरती पर गिरने लगा। मालिन श्रीकृष्ण के सौंदर्य को निहारने में खो रही थी। भगवान श्रीकृष्ण के हाथों से गिरने से बचे धन के कणों को उसने अपने हाथों में लिया और वह श्रीकृष्ण के हाथों में फल रखने लगी। फल रखने के निमित्त मालिन ने अपना सर्वस्व भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया। आदान-प्रदान के इस पावन क्रम में मालिन की देह श्रीकृष्ण का स्पर्श पाकर पावन हो चुकी थी। मालिन सुखिया भगवान श्रीकृष्ण की नित्य किंकरी बन चुकी थी। उसकी टोकरी रत्नों से भर चुकी थी। उसके लिए अब कुछ भी पाना शेष नहीं रह गया था।

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जीणमाता की सर्वमान्य लोक कथा

June 21st, 2008 admin Posted in रोचक कथाएँ | No Comments »

श्रीजीण माता के एक प्रमुख लोक गीत के अनुसार जिला चुरू राजस्थान के ग्राम धाधूँ के चौहान राजपूत वंश में हर्ष एवं जीण का जन्म हुआ। हर्ष उम्र में बड़े एवं जीण छोटी थी। बाल्यकाल में ही इनके माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। विधि के विधान पर संतोष कर हर्ष अपनी छोटी बहन जीण को और भी अधिक स्नेह से रखने लगे। कुछ वर्ष पश्चात हर्ष का विवाह हो गया। विवाहोपरांत हर्ष की पत्नी, बहन जीण एवं हर्ष तीनों ही सुखमय जीवन बिताने लगे। एक दिन सरोवर पर भाभी एवं जीण जल लाने हेतु गए। गाँव की सखी सहेलियाँ भी उनके साथ थीं। यहाँ भाभी एवं ननद की इस बात को लेकर तर्क-वितर्क हो गया कि हर्ष अपनी बहन जीण को अधिक स्नेह करते हैं या अपनी पत्नी को। अंततः दोनों में यह शर्त्त लगी कि पानी का मटका लेकर दोनों एक साथ घर चलते हैं। जिसका मटका हर्ष पहले उतारेंगे, उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह है, यह समझा जाएगा। हर्ष अपनी पत्नी एवं बहन के इस विवाद एवं उनके बीच लगाई गई इस शर्त्त से अनभिज्ञ थे।
पानी का मटका लेकर दोनों ननद-भावज जब घर पहुँचीं तो हर्ष ने अपनी पत्नी के सर से पानी का मटका पहले उतारा। इस घटना से जीण को गहन आत्मग्लानि हुई, और उसे हार्दिक ठेस भी लगी। भ्रात पे्रम में अभाव जान, जीण को इस संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया। वह उसी समय घर से निकल पड़ी। भाई हर्ष को जब इस बात का पता चला तो वह अपनी बहन जीण को मनाने हेतु उसके पीछे निकल पड़े। बहन जीण ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। जीण ने अरावली पर्वतमाला के काजल शिखर पर आकर चैन की साँस ली। हर्ष भी जीण के निकट पहुँच गये। वह अपनी भूल के लिए जीण से क्षमा याचना करने लगे। हर्ष ने अपनी बहन से घर लौट चलने हेतु अनेक बार मनुहार भी की। बहन जीण को मनाने हेतु हर्ष ने उसे अनेक प्रलोभन भी दिए। किन्तु जीण ने उन प्रलोभनों को स्वीकार नहीं किया। वह अपने प्रण में अटल रही कि वह अब घर नहीं लौटेगी। जीण के इस दृढ़ निश्चय से द्रवित हर्ष ने भी घर नहीं लौटने का निर्णय लिया। भाई हर्ष, वर्त्तमान समय में हर्षनाथ भैरू स्थान पर भैरव बाबा की साधना में तल्लीन हो गये। जीण ने नौदुर्गा माता की कठोर तपस्या की। जीण इस कठोर तप से प्राप्त सिद्धि के बल पर साक्षात दुर्गा स्वरूपा बन गईं। हर्ष भी भैरव की साधना करने के कारण स्वयं हर्षनाथ भैरू बन गए। जीण एवं हर्ष ने कठोर साधना के बल पर देवत्व प्राप्त किया। इनकी पूजा अर्चना करने वालों के मनोरथ पूर्ण होने लगे। फलतः इन दानों की ख्याति संसार में व्याप्त होने लगी।
श्री जीणमाता साक्षात जयंती महाचंडी, महिषासुर नासिनी अम्बे माँ हैं। जीणधाम में बच्चों के जड़ूले, मुंडन संस्कार एवं गठजोड़े की जात लगाई जाती है। जीण माता धाम में विशेष मर्यादाओं एवं परम्पराओं से पाराशर गोत्रीय ब्राह्मणों एवं चौहानों द्वारा पूजा-अर्चना की की जाती है। जीणधाम में मदिरा का भोग लगाना एवं बली प्रथा का पिछले सात वर्षों से कानूनी निषेध है।
जीणधाम में माता की शरण में आने वाले भक्तों के समस्त कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। भाद्रपद महिने में यहाँ प्रतिवर्ष देवी भागवत का पाठ आयोजित किया जाता है। चैत्रा एवं आश्विन नवरात्रा पर मेलों के अवसर पर लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहाँ दर्शनार्थ पधारते हैं।

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