भागवत के प्रमुख पात्र - जब श्रीकृष्ण मथुरा के पास एक गुफा में छुप गए थे
महाराजा मुचुकुन्द सूर्यवंश के प्रतावी राजा मान्धता के सुपत्रा थे। महाराजा मुचुकुन्द अपने समय के सबसे प्रतापी राजा थे। उनके बल एवं पराक्रम की बराबरी करने वाला पृथ्वी पर उस समय दूसरा कोई नहीं था। उन दिनों देवता मुचुकुन्द से सैन्य सहायता लेने को उतावले रहते थे। एकबार जब देवताओं का असुरों के संग भयंकर संग्राम हुआ तो देवताओं ने महाराजा मुचुकुन्द से देवताओं का सेनापति बनने का आग्रह किया। देवताओं की प्रार्थना सुनकर महाराजा मुचुकुन्द ने देवलोक जाकर असुरों से घोर युद्ध किया और उसमें सफलता भी पाई। आगे चलकर शिव सुपुत्र भगवान कार्त्तिकेय को देवताओं का सेनापति बनाया गया। तदन्तर देवराज इंद्र ने महाराजा मुचुकुन्द से प्रार्थना पूर्वक कहा-राजन्! आपने देवताओं की बड़ी सेवा की है। आपने स्त्री, पुत्र और अपना राज्य छोड़कर हम देवताओं की रक्षा में हजारों वर्ष बिताए हैं। आपकी इस सेवा से हम देवता आपसे विशेष प्रसन्न हैं। मोक्ष के अतिरिक्त आप हमसे कुछ भी मांग लीजिए हम आपको देने हेतु तत्पर हैं।’
असुरों के साथ अनवरत युद्ध करते रहने के कारण महाराजा मुचुकुन्द को सोने का अवसर नहीं मिला था। अतः उन्होंने देवराज से इंद्र से दीर्घकालन निद्रा का वरदान मांगते हुए कहा कि जो भी मेरी निद्रा में विन डाले वह तकल जलकर भष्म हो जाए।
इंद्र से यह अद्भुद वरदान प्राप्त कर महाराजा मुचुकुन्द पृथ्वी पर लौट आए और मथुरा नगरी के पास ही एक शांत गुफा में सो गए। द्वापर युग में जब भगवान श्रीकृष्ण का जन्म हुआ तो इस बात का पता अन्तर्यामी भगवान श्रीकृष्ण को स्वभावतः था। एक दिन भगवान श्रीकृष्ण ने असुरराज कालनेमी को अपने पीछे भागने को विवश कर दिया। आगे-आगे श्रीकृष्ण, पीछे-पीछे असुर कालनेमी। कालनेमी से बचते-बचते श्री कृष्ण उसी गुफा के अंदर आकर छुप गए जिसमें महाराजा मुचुकुन्द गहन निद्रा ले रहे थे। लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण ने चुपके से अपना पीताम्बर महाराजा मुचुकुन्द के उपर रख दिया। भगवान का पीछा करते-करते राक्षस कालनेमी उसी गुफा के अंदर प्रवीष्ट हुआ। उसने पीताम्बर ओड़े सो रहे महाराजा मुचुकुन्द को श्रीकृष्ण समझकर उनपर लात से प्रहार किया। इससे महाराजा मुचुकुन्द की निद्रा टूट गई। आँख खुलते ही उन्होंने अपने समक्ष राक्षस कालनेमी को देखा। कालनेमी तत्काल ही भस्म हो गया। वस्तुतः श्रीकृष्ण असुर कालनेमी को उस गुफा के अंदर महाराजा मुचुकुन्द द्वारा भस्म करवाने के उद्देश्य से लाना चाहते थो।
कालनेमी के भस्म होते ही भगवान श्रीकृष्ण महाराजा मुचुकुन्द के सामने प्रगट हुए। भगवान ने अपने शरीर पर पीतम्बर, कौस्तुभ मणी, धारण कर रखा था। उनकी चार भुजाएँ थीं। मेघ वर्ण श्याम स्वरूप श्रीकृष्ण को अपने समक्ष देखकर महाराजा मुचुकुन्द भावविभोर हो गए। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की स्तुति की और उनसे अनन्य भक्ति उपासना का वरदान मांगा। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-राजन यह कालनेमी असुर मेरी प्रेरणा से तुम्हारी दृष्टि पड़ते ही भस्म हो गया। मुचुकुन्द तुम पहले ही मेरी अराधना कर चुके हो? मैं तुम्हें तुम्हारा अभिष्ट वर देता हूँ। तुम मेरी अनन्य भक्ति को प्राप्त करोगे। यह कहकार भगवान अन्तर्ध्यान हो गए।
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