श्री गणेशाय नम: :: श्याम प्रभु खाटू वाले का मुख्य समाचार पत्र ::


जीणमाता की सर्वमान्य लोक कथा

श्रीजीण माता के एक प्रमुख लोक गीत के अनुसार जिला चुरू राजस्थान के ग्राम धाधूँ के चौहान राजपूत वंश में हर्ष एवं जीण का जन्म हुआ। हर्ष उम्र में बड़े एवं जीण छोटी थी। बाल्यकाल में ही इनके माता-पिता स्वर्ग सिधार गए। विधि के विधान पर संतोष कर हर्ष अपनी छोटी बहन जीण को और भी अधिक स्नेह से रखने लगे। कुछ वर्ष पश्चात हर्ष का विवाह हो गया। विवाहोपरांत हर्ष की पत्नी, बहन जीण एवं हर्ष तीनों ही सुखमय जीवन बिताने लगे। एक दिन सरोवर पर भाभी एवं जीण जल लाने हेतु गए। गाँव की सखी सहेलियाँ भी उनके साथ थीं। यहाँ भाभी एवं ननद की इस बात को लेकर तर्क-वितर्क हो गया कि हर्ष अपनी बहन जीण को अधिक स्नेह करते हैं या अपनी पत्नी को। अंततः दोनों में यह शर्त्त लगी कि पानी का मटका लेकर दोनों एक साथ घर चलते हैं। जिसका मटका हर्ष पहले उतारेंगे, उसके प्रति ही हर्ष का अधिक स्नेह है, यह समझा जाएगा। हर्ष अपनी पत्नी एवं बहन के इस विवाद एवं उनके बीच लगाई गई इस शर्त्त से अनभिज्ञ थे।
पानी का मटका लेकर दोनों ननद-भावज जब घर पहुँचीं तो हर्ष ने अपनी पत्नी के सर से पानी का मटका पहले उतारा। इस घटना से जीण को गहन आत्मग्लानि हुई, और उसे हार्दिक ठेस भी लगी। भ्रात पे्रम में अभाव जान, जीण को इस संसार के प्रति वैराग्य उत्पन्न हो गया। वह उसी समय घर से निकल पड़ी। भाई हर्ष को जब इस बात का पता चला तो वह अपनी बहन जीण को मनाने हेतु उसके पीछे निकल पड़े। बहन जीण ने पीछे मुड़कर भी नहीं देखा। जीण ने अरावली पर्वतमाला के काजल शिखर पर आकर चैन की साँस ली। हर्ष भी जीण के निकट पहुँच गये। वह अपनी भूल के लिए जीण से क्षमा याचना करने लगे। हर्ष ने अपनी बहन से घर लौट चलने हेतु अनेक बार मनुहार भी की। बहन जीण को मनाने हेतु हर्ष ने उसे अनेक प्रलोभन भी दिए। किन्तु जीण ने उन प्रलोभनों को स्वीकार नहीं किया। वह अपने प्रण में अटल रही कि वह अब घर नहीं लौटेगी। जीण के इस दृढ़ निश्चय से द्रवित हर्ष ने भी घर नहीं लौटने का निर्णय लिया। भाई हर्ष, वर्त्तमान समय में हर्षनाथ भैरू स्थान पर भैरव बाबा की साधना में तल्लीन हो गये। जीण ने नौदुर्गा माता की कठोर तपस्या की। जीण इस कठोर तप से प्राप्त सिद्धि के बल पर साक्षात दुर्गा स्वरूपा बन गईं। हर्ष भी भैरव की साधना करने के कारण स्वयं हर्षनाथ भैरू बन गए। जीण एवं हर्ष ने कठोर साधना के बल पर देवत्व प्राप्त किया। इनकी पूजा अर्चना करने वालों के मनोरथ पूर्ण होने लगे। फलतः इन दानों की ख्याति संसार में व्याप्त होने लगी।
श्री जीणमाता साक्षात जयंती महाचंडी, महिषासुर नासिनी अम्बे माँ हैं। जीणधाम में बच्चों के जड़ूले, मुंडन संस्कार एवं गठजोड़े की जात लगाई जाती है। जीण माता धाम में विशेष मर्यादाओं एवं परम्पराओं से पाराशर गोत्रीय ब्राह्मणों एवं चौहानों द्वारा पूजा-अर्चना की की जाती है। जीणधाम में मदिरा का भोग लगाना एवं बली प्रथा का पिछले सात वर्षों से कानूनी निषेध है।
जीणधाम में माता की शरण में आने वाले भक्तों के समस्त कष्ट स्वयं ही दूर हो जाते हैं। भाद्रपद महिने में यहाँ प्रतिवर्ष देवी भागवत का पाठ आयोजित किया जाता है। चैत्रा एवं आश्विन नवरात्रा पर मेलों के अवसर पर लाखों श्रद्धालु देश-विदेश से यहाँ दर्शनार्थ पधारते हैं।


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