कृष्ण शब्द के अनेक अर्थ हैं। कृष् धतु का एक अर्थ है खेत जोतना, दूसरा अर्थ है आकर्षित करना। वे जो खींच लेते हैं, वे जो प्रत्येक को अपनी ओर आकर्षित करते हैं, जो सम्पूर्ण संसार के प्राण हैं- वही हैं कृष्ण। कृष्ण का अर्थ है विश्व का प्राण। उसकी आत्मा। कृष्ण का तीसरा अर्थ है वह तत्व जो सबके ‘मैं’ पन’ में रहता है। मैं हूँ क्योंकि कृष्ण है। मेरा अस्तित्व है क्योंकि कृष्ण का अस्तित्व है। अर्थात यदि कृष्ण नहीं हों तो मेरा अस्तित्व ही नहीं होगा। मेरा अस्तित्व पूर्णतः कृष्ण पर निर्भर करता है। मेरा होना ही कृष्ण के होने का लक्षण या प्रमाण है। कृष्ण कहते हैं ये यथा मां प्रपद्यन्ते जो कुछ भी हम स्पर्श करते हैं जो भी हम इस विश्व में देखते हैं, वह सब कुछ कृष्ण का ही है।
तुम अपनी इच्छाओं और वृतियों के अनुसार, उनसे जो भी चाहते हो, तुम पाओगे। तुम जो धन मांगते हो तो धन पाओगे, किन्तु उनको नहीं पाओगे। क्योंकि तुम धन मांगते हो, उनको नहीं। तुम उनसे यदि नाम और यश मांगोगे, तो वह भी मिलेगा, किन्तु वे नहीं मिलेंगे, क्योंकि तुम उनको नहीं मांगते हो। तुम उनके द्वारा कुछ मांगते हो। यदि तुम चाहते हो कि वे तुम्हारे शत्रुओं का नष्ट कर दें और तुम धर्म के पथ पर हो, तुम्हारी मांग उचित है तो वे तुम्हारे शत्रुओं का नाश कर देंगे, किन्तु तुम उन्हें नहीं पाओगे। क्योंकि तुम उन्हें नहीं मांगते हो। तुम उनसे यदि मुक्ति और मोक्ष मांगते हो, ओर यदि तुम योग्य पात्र हो तो उनसे प्राप्त कर लोगे। किन्तु उनको नहीं पा सकोगे। क्योंकि तुमने उन्हें नहीं मांगा।
अतः एक बुद्धिमान साधक कहेगा मैं तुम्हे ही चाहता हूँ और किसी को नहीं चाहता और मैं तुम्हे क्यों चाहता हूँ? इसीलिए नहीं कि तुम्हारी उपस्थिति मुझे सुख देगी, बल्कि इसलिए कि तुम्हारी उपस्थिति मुझे तुम्हारी सेवा का अवसर देगी। पौराणिक कहानी है कि राम लक्ष्मण गंगा पार कर रहे थे। गंगा के दूसरे तट पर पहुँचने के बाद नाविक ने देखा कि उसकी काठ की नाव सोने की नाव बन गई है। नाविक ने सोचा निःसंदेह यह छोटे बालक कोई असाधारण बालक हैं। इन्हीं के स्पर्श से यह काठ की नाव सोने की नाव बन गई है। नाविक की पत्नी घर का सारा काठ का सामान वहाँ उठा लाई। उसने राम से उन सबों का स्पर्श कराया, और वे सब के सब सोने के बन गए। तब नाविक ने कहा तुम व्यवहारिक नहीं हो। नहीं जानती कि क्या करना चाहिये। ये गुण उनके श्री चरणों का है। यदि तुम बुद्धिमति होती तो इन चरणों को ही अपने घर ले जाती। यानि उन्हें अनुरोध कर अपने घर ले जाती। तब सारा घर ही स्वर्णमय हो जाता।
यही रहस्य की बात है। अतः बुद्धिमान साधक क्या कहेगा? वह कहेगा- मैं तुमसे कुछ नहीं चाहता। तुमसे ही सबकुछ मिलता है, इसलिए तुम्हीं मेरे बन जाओ। किन्तु किसलिए मेरे बनो? स्वयं आनन्दित होने के लिए नहीं मैं उन्हें आनन्द देने के लिए। जो इस प्रकार परम पुरुष को आनन्द देना चाहते हैं, वही संस्कृत में गोप कहे जाते हैं-गोपायते यः सः गोपः। जो जन-जन को आनन्द देना ही अपना कर्त्तव्य समझते हैं वह गोप हैं न कि वे जो गाय पालते हैं। ये यथा मां प्रपद्यन्ते, तांस्तथैव भजाम्यहं।
जो भी मुझसे जो मांगता है मैं उसे वह देता हूँ मेरा यह कर्त्तव्य है। यह तुमपर निर्भर करता है कि तुम अपनी मानसिक वृतियों या आवश्यक्ताओं के अनुसार मुझसे क्या मांगते हो। किन्तु अर्जुन एक बात याद रखो, मेरे द्वारा बनाए मार्ग का ही अंततः बिना किसी अपवाद के सब को अनुगमन करना ही होगा। कोई इस मार्ग की अवहेलना नहीं कर सकेगा। सबको मेरे ही चारों ओर घूमना है। चाहे वह छोटा वयास बनाकर घूमे अथवा बड़ा व्यास बनाकर। अन्य कोई विकल्प नहीं है।

