सरिस्का में भीम ने हनुमानजी की पूँछ हटाने का असफल प्रयास किया था
अलवर : ‘इप्टा’ ने मशहूर शायर कैफी आजमी की स्मुति में एकल गायन प्रतियोगिता का आयोजन अलवर में १० मई ०८ को किया। इस प्रतियोगिता में जज की भूमिका श्री श्याम संसार के सम्पादक श्री संजय प्रभाकर को विशेष रूप से आमंत्रित किया गया था। श्री संजय प्रभाकर अलवर में नवनिर्मित तारिणी कैंसर हॉस्पीटल एवं रिसर्च सेंटर डॉ. आर. एन. मित्तल एवं डॉ. श्रीमती सुजाता मित्तल के अतिथि बने। यहाँ श्री संजय प्रभाकर ने कैंसर रोगियों के लिए भजन गायन किया। अगले दिन मित्तल परिवार के साथ सरिस्का वन विहार में स्थित महाभारतकालीन पांडूपोल मंदिर के दर्शन का सौभाग्य मिला। सरिस्का में विभिन्न पशु पक्षियों को देखने पर पता चला कि यहाँ वन्यजीवों के लिए सुविधाओं का नितान्त अभाव है। महाभारतकालीन पांडूपोल मंदिर में रामभक्त हनुमानजी की विश्राम करने की मुद्रा में प्रतिमा के दुर्लभ दर्शन मिले। सरिस्का का पांडूपोल मंदिर के आस-पास के प्राकृतिक दृष्य यह सिद्ध कर रहे थे कि वास्तव में यह स्थान दिव्य गुणों से युक्त है।
पांडूपोल तीर्थ का इतिहास एवं महत्व :महाभारतकाल में पांडवों को १२ वर्ष का अज्ञातवास मिला। पांडवगण अपनी पत्नी द्रोपदी के साथ विराटनगर की ओर बढ़े। अलवर के समीप एक निर्जन स्थान में उन्होंने एक दिन का विश्राम किया। तदुपरान्त वह विराटनगर की ओर पुनः चल पड़े। लगभग एक किमी. चलने के बाद उन्हें आगे का मार्ग नहीं दिखा। वहाँ एक विशाल पर्वत उनकी यात्रा में अवरोध उत्पन्न कर रहा था। तभी महावीर भीम ने अपने भ्राता धर्मराज युधिष्ठिर से आज्ञा लेकर विशाल पर्वत पर अपनी गदा से प्रहार किया। गदा के प्रहार से पर्वत दो टुकड़ों में विभाजित हो गया। वहाँ एक पोल बन गया जिससे जल की धरा बह निकली। वह जलधरा आज भी वहाँ अनवरत बह रही है। इस घटना से महाबली भीम में अभिमान आ गया। तभी अंतरयामी प्रभु ने यह विचार किया कि कहीं भीम का अभिमान सीमाएँ न लाँघ जाए, अतः उन्होंने श्रीराम भक्त बजरंगबली को वृद्ध वानर के रूप में भीम का भीम हनुमानजी को पहचान नहीं पाए। उन्होंने वृद्ध वानर से अभिमान पूर्वक कहा ऐ वानर! मैं महाबली भीम हूँ, तुम अपनी यह पूँछ हमारे रास्ते से हटालो। हनुमानजी ने कहा कि मैं अति वृद्ध हो गया हूँ। मुझसे मेरी पूँछ हटाई नहीं जा सकती है, कृपाकर आप स्वयं ही मेरी पूँछ उठाकर एक ओर रख दें, और अपना मार्ग बनालें।
भीम ने सोचा यह एक साधारण बूढ़ा वानर है। वह उस वानर की पूँछ हटाने लगे। किन्तु यह क्या, पूँछ टस से मस नहीं हुई। तभी हनुमानजी ने भीम को अपनी पूँछ तले दबा लिया। तब जाकर भीम को समझ में आया कि यह वानर कोई साधरण वानर नहीं है। भीम का अभिमान चूर हो चुका था। भीम ने बूढ़े वानर से कहा कि आप कौन हैं, अपने वास्तिवक स्वरूप में दर्शन देने की कृपा करें। हनुमानजी ने प्रभु के आदेश से यह लीला करने के पश्चात अपने वास्तविक स्वरूप में पांडवों को दर्शन दिए। उन्होंने पांडवों को इस स्थान पर एक भव्य हनुमान मंदिर बनाने का आदेश दिया। श्री हनुमानजी ने पांडवों को उनका अज्ञातवास सफल होने का आशीर्वाद भी दिया। पांडवों ने उस रमणीक स्थान पर पांडूपोल श्री हनुमान मंदिर का निर्माण करवाया। इस मंदिर में पांडवों द्वारा स्थापित हनुमानजी की उसी मुद्रा में प्रतिमा है, जिस मुद्रा में हनुमानजी ने वृद्ध स्वरूप में भीम के मार्ग में अपनी पूँछ को अवरोध बनाया था। हनुमानजी ने पांडवों से कहा था कि तुम्हारे द्वारा निर्मित यह मंदिर कलियुग में यहाँ आने वाले भक्तों के संकट दूर करेगा।
सरिस्का अभयारण्य के अंतर्गत पांडूपोल मंदिर एक गुप्त क्षेत्र दर्शनार्थियों को मानसिक शांति मिलती है और उनके समस्त पाप धुल जाते हैं। यहाँ प्रतिवर्ष वैशाख महिने में मेला लगता है। पांडूपोल मंदिर के महंत पंडित रणत भँवरजी हैं जो विगत ५ पीढ़ियों से इस पौराणिक मंदिर में हनुमानजी की सेवा-पूजा कर रहे हैं।
मैंने बाद में श्री संजय प्रभाकर ने सोचा कि इप्टा का कार्यक्रम न होता, डॉ. मित्तल के सुपुत्र श्री रीतेश मित्तल ने इप्टा को उनके बारे में न बताया होता तो पांडूपोल का दिव्य मंदिर उनके लिए कुछ और समय के लिए गुप्त ही रहता। पांडूपोल मंदिर से लौटते समय राजा भर्तहरि के मंदिर के भी दर्शन का सुअवसर मिला। इप्टा के कैपफी आजमी स्मृति समारोह में श्री सुरेश चन्द जसोदिया, श्री निलेश खंडेलवाल व श्री अतुल झालानी मुख्य अतिथि थे। इप्टा अलवर के अध्यक्ष श्री नगेन्द्र जैन, महासचिव श्री महेन्द्र सिंह एवं संयोजक श्री राजेश भारद्वाज ने प्रतियोगिता को सफल बनाया।
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